अप्रैल 25, जिस दिन सत्य और मानवता ने न्यायालय में दम तोड़ा

24 अप्रैल 2021

azaadbharat.org

परम सत्य है कि कानून का दुरुपयोग चरम सीमा पर है। हिन्दू सन्तों को झूठे मुकदमों में फंसाना और मीडिया द्वारा बदनाम करवाना फैशन बन गया है।

25 अप्रैल 2018 को जोधपुर सेशन कोर्ट का एक फैसला आया जिससे सारी मानवता शर्मसार हुई। एक लड़की की झूठी गवाही के चलते देशहित, समाजहित और प्राणिमात्र के हित में जिन्होंने अपने जीवन के 55 साल दे दिए, जिनके आश्रम में आज भी सैकड़ों महिलाएं संयमी जीवन व्यतीत कर रही हैं और करोड़ों महिला समर्थक जिनके लिए सड़कों पर उतरीं, ऐसे संत आशाराम बापूजी को उम्रकैद और शरद व शिल्पी को 20-20 साल की सजा सुनाई गई।

अगर ऐसे ही हिन्दू संस्कृतिरक्षक संतों पर अत्याचार होता रहा और हिन्दू मूकदर्शक बन सब देखता रहा तो आनेवाले समय में हिन्दू संस्कृति का नामोनिशान नहीं रहेगा।

अब आईये, आपको इस झूठे केस के मुख्य पहलुओं से अवगत करायें। आप सबसे अनुरोध है कि इस केस को समझने के लिए आप अपनी बुद्धि का उपयोग जरूर कीजियेगा तभी आपके सामने सारी परतें खुलती नजर आएंगी।

19 अगस्त 2013 की मध्यरात्रि 2:45 को दिल्ली के कमला मार्किट पुलिस थाने में जोधपुर (राजस्थान) में हुई घटना की शाहजहांपुर (उत्तर प्रदेश) के परिवार द्वारा Zero FIR दर्ज होती है। आपको लगता है कि भारत देश की पुलिस व्यवस्था इतनी अच्छी है, इतनी मददगार है कि जोधपुर (राजस्थान) की घटना, उत्तर प्रदेश की लड़की और उसकी FIR दर्ज करेगी दिल्ली में??

पिछले 7 सालों से दीपक चौरसिया पर पॉक्सो एक्ट के तहत केस के लिए गुरुग्राम के एक माता-पिता की चपलें घिस गईं, कई हिन्दू संगठन FIR करवाने के लिए आगे आये पर आज तक पुलिस ने दीपक चौरसिया के खिलाफ कोई एक्शन नहीं लिया।

ऐसे प्रशासन से ये उम्मीद की जा सकती है कि वो इतनी आसानी से कहीं का केस और कहीं की लड़की की FIR इतनी आसानी से दर्ज कर लेगी??

अच्छा आगे देखिए…

फिर FIR की Video Recording जो Zero FIR में अनिवार्य प्रावधान है वो संदेहास्पद परिस्थितियों में गायब कर दी गई या मिटा दी गई। संबंधित पुलिस अधिकारी भी अपने बयान में इस बात की पुष्टि करती है कि वीडियो रिकॉर्डिंग हुई थी।
वीडियो रिकॉर्डिंग का कोर्ट में साक्ष्य के तौर पर पेश न होना क्या किसी षड़यंत्र की तरफ इशारा तो नहीं??

आगे बढ़ते हैं- कोर्ट में खुद लड़की, उसकी माँ और उसके पिता ने गवाही दी कि आशारामजी बापू ने 15 अगस्त 2013 की रात को जोधपुर के मणाई गांव में हरिओम कृषि फार्म में अपने कमरे में लड़की को बुलाकर 60 से 90 मिनट तक लड़की के साथ छेड़छाड़ की। लड़की ने अपने बयान में कहा कि मैं जोर से चिल्लाई और रोती रही। उसकी माँ ने अपने बयान में कहा कि वो कमरे के बाहर बैठी थी। लेकिन बाहर बैठी माँ को लड़की के चिल्लाने और रोने की आवाज नहीं आई रात के सन्नाटे में। क्या ऐसा संभव है?

दूसरी ओर कोर्ट में पेश हुए बचाव पक्ष के 5 गवाहों ने और लड़की के पक्ष के 2 गवाहों ने अपने बयानों में कहा कि आशारामजी बापू ने उस रात पहले सत्संग किया फिर सगाई समारोह के निमित भगवान झूलेलाल की झांकी निकाली गई जो रात 11:45 तक चली; उस समय के कई फोटो भी न्यायालय के सामने 2014 से हैं। मदनसिंह जो वहाँ चौकीदार था, उसने भी गवाही दी कि उस रात बापू अपनी कुटिया में रात 12:00 बजे आये। आखिर क्यों जज साहब ने इन सभी तथ्यों को नजरअंदाज किया ???

चारुल अरोड़ा, मेघा शर्मा (लड़की की दोस्त), कुमारी प्रिया सिंह, कुमारी रीना, कुमारी विद्या (वार्डन) ने कोर्ट में गवाही दी कि लड़की 15 अगस्त 2013 को बालिग थी और उसका चाल चलन ठीक नहीं था पर कोर्ट के लिए ये पांचों लड़कियां झूठी थीं और वो अकेली सती सावित्री हो गयी।

राहुल के सचान, महेंद्र चावला ने बापू के खिलाफ गवाही दी पर योगेश भाटी, जिज्ञासा भावसार, अंग्रेज़ सिंह (J&K Police ASI) ने कोर्ट में हुए अपने बयान में कहा कि अमृत प्रजापति, कर्मवीर सिंह (लड़की का पिता), राहुल के सचान, महेंद्र चावला ने योग वेदांत सेवा समिति, अहमदाबाद को Fax करके 50 करोड़ की फिरौती मांगी थी, जिसमें ये भी कहा कि अगर 50 करोड़ नहीं दिए तो झूठी लड़कियां तैयार करके झूठे केस में फंसा देंगे और वो कभी बाहर नहीं आ पाएंगे, पर कोर्ट ने इनके ऊपर कोई एक्शन नहीं लिया।

शिल्पा अग्रवाल जो कि Psychologist हैं, उन्होंने बापूजी का कई बार इंटरव्यू लिया है। उन्होंने अपने बयान में कहा कि बापू का मन, बुद्धि और आत्मा एकाग्र है। उनकी भगवान में गहरी आस्था है और मानवता की सेवा करने की सुदृढ़ इच्छाशक्ति है, वो किसी से दुष्कर्म के विषय में सोच भी नहीं सकते… करने की तो बात ही अलग है। उनकी रिपोर्ट भी कोर्ट के सामने होने के बावजूद उस पर कोई ध्यान नहीं दिया गया।

लड़की की उम्र के संबंध में कई ऐसे दस्तावेज बचाव पक्ष द्वारा साबित करवाए गए (जैसे- राशन कार्ड, पोषाहार रजिस्टर की प्रति, शिशु पंजीकरण, टीकाकरण रजिस्टर में प्रविष्टियां, सर्वे रजिस्टर आदि) जिनमें लड़की बालिग साबित हो रही है,
उन सभी तथ्यों को नजरअंदाज करके एक ऐसे ( Matriculation Certificate) सर्टिफिकेट के आधार पर बापू आशारामजी को सजा सुनाई गई जिसमें लड़की के वकील ने खुद 311 की एप्लीकेशन लगाकर कहा था कि हम इसे साबित नहीं करवा पाए हैं।

POCSO Act और Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Act 2000 में सजा सुनाना कहाँ का न्याय है?

जिन 3 धाराओं में बापू आसारामजी को उम्रकैद की सजा सुनाई अब उनके बारे में बात करते हैं:
भारतीय दंड संहिता 1860 की धारा 370 (4) जो कि Trafficking of Persons के अपराध से संबंधित है। 9 अगस्त 2013 को लड़की का पिता खुद छुट्टी का आवेदन पत्र देकर लड़की को अपने साथ घर ले जाता है (आवेदन पत्र चार्जशीट में संलग्न है); 9 तारीख के बाद से लड़की अपने माता-पिता की कस्टडी में रही, तब कैसे आसारामजी बापू ने उसका अपहरण या Trafficking किया ???

भारतीय दंड संहिता 1860 की धारा 376 (2) (f) जो Relative, Guardian, Teacher द्वारा बलात्कार करने से संबंधित है; पर बलात्कार हुआ ही नहीं है, लड़की ने खुद FIR में बलात्कार का जिक्र नहीं किया और न ही Medical Report में छेड़छाड़ तक की पुष्टि हुई है। फिर भी आशारामजी बापू सजा के हकदार हैं।

वाह री, न्याय व्यवस्था!
अजब तेरे खेल !!
निर्दोषों को भेजती जेल!
अपराधियों को देती बेल !!

हिन्दू संतों को कानून के दुरुपयोग से प्रताड़ित करना और निचली अदालत में दोषी साबित होना कोई नई बात नहीं।
साध्वी प्रज्ञा, जयेंद्र सरस्वती शंकराचार्यजी, स्वामी असीमानंदजी, कर्नल पुरोहित, केशवानन्दजी महाराज को निचली अदालत ने दोषी ही करार दिया था पर वो ऊपरी अदालत से बरी होकर आए।
राष्ट्र, सनातन धर्म व समाज सेवा में 55 वर्षों से रत संत आशारामजी बापू भी निर्दोष बरी होंगे- ऐसी जनता बता रही है।

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