पोंगल महापर्व: वैदिक सूर्योपासना, अन्नब्रह्म और प्रकृति-कृतज्ञता का सनातन उत्सव

🚩पोंगल महापर्व: वैदिक सूर्योपासना, अन्नब्रह्म और प्रकृति-कृतज्ञता का सनातन उत्सव

💠पोंगल भारत की प्राचीन सनातन परंपरा से जुड़ा हुआ एक पवित्र कृषि पर्व है, जिसे मुख्य रूप से तमिलनाडु में मनाया जाता है। यह पर्व सूर्य देव, धरती माता, अन्न और पशुओं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का प्रतीक है। वैदिक ग्रंथों, उपनिषदों और पुराणों में सूर्य को जीवनदाता, अंधकार का नाश करने वाला और ब्रह्मांड की ऊर्जा का स्रोत बताया गया है। ऋग्वेद में सूर्य को तमस का विनाशक कहा गया है, जबकि सूर्योपनिषद में उन्हें ब्रह्म का प्रत्यक्ष स्वरूप माना गया है। पोंगल मकर संक्रांति के समय मनाया जाता है, जब सूर्य उत्तरायण में प्रवेश करता है। शास्त्रों में इस काल को देवयान कहा गया है, अर्थात देवताओं का मार्ग, जो आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत शुभ माना जाता है। तैत्तिरीय उपनिषद में “अन्नं ब्रह्म” कहा गया है, अर्थात अन्न ही ब्रह्म है, इसलिए पोंगल में अन्न का पूजन विशेष महत्व रखता है।

💠तमिल भाषा में पोंगल का अर्थ उफनना या छलकना होता है, जो समृद्धि और परिपूर्णता का प्रतीक है। इस पर्व में नए चावल, दूध और गुड़ को मिट्टी के बर्तन में पकाया जाता है और सूर्य देव को अर्पित किया जाता है। जब दूध उफनकर बाहर आता है, तो इसे शुभ संकेत माना जाता है और “पोंगलो पोंगल” कहा जाता है। यह अनुष्ठान वैदिक यज्ञ का सरल रूप है, जिसमें अग्नि, सूर्य और अन्न को साक्षी मानकर कृतज्ञता प्रकट की जाती है। यजुर्वेद में अग्नि को पवित्र करने वाला देवता कहा गया है, इसलिए अग्नि के माध्यम से शुद्धि और त्याग का भाव प्रकट किया जाता है।

💠पोंगल पर्व चार दिनों तक मनाया जाता है और प्रत्येक दिन का अपना धार्मिक महत्व होता है।
🔅पहले दिन भोगी पोंगल मनाया जाता है, जो इंद्र देव को समर्पित होता है। इस दिन पुराने और अनुपयोगी सामान को अग्नि में समर्पित किया जाता है, जिससे नकारात्मकता, आलस्य और अज्ञान का त्याग हो सके। घरों की सफाई की जाती है, गोबर से लीपकर शुद्धि की जाती है और द्वार पर कोलम बनाई जाती है, जिससे सकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश हो। यह दिन जीवन में नए आरंभ का प्रतीक है।
🔅दूसरा दिन सूर्य पोंगल कहलाता है और यही इस पर्व का मुख्य दिन होता है। इस दिन खुले आकाश के नीचे सूर्य देव की पूजा की जाती है और उन्हें अर्घ्य दिया जाता है। नए अन्न से बना पोंगल प्रसाद सूर्य को अर्पित किया जाता है और उनसे उत्तम फसल, स्वास्थ्य और समृद्धि की प्रार्थना की जाती है। वैदिक परंपरा में सूर्य को कालचक्र का नियंत्रक, ऋतुओं का संचालक और प्राणदाता माना गया है। इसलिए सूर्य पोंगल केवल उत्सव नहीं, बल्कि सूर्य उपासना का एक पवित्र अनुष्ठान है।
🔅तीसरा दिन मट्टू पोंगल कहलाता है और यह गाय तथा बैल जैसे पशुओं को समर्पित होता है। वैदिक ग्रंथों में गाय को अघ्न्या कहा गया है, अर्थात जिसे मारा न जाए। गौ माता को पृथ्वी का स्वरूप और अन्न की जननी माना गया है। इस दिन गाय-बैल को स्नान कराया जाता है, उन्हें फूलों से सजाया जाता है, उनके सींगों पर रंग लगाया जाता है और उनकी आरती की जाती है। यह पशुओं के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का पर्व है, क्योंकि कृषि व्यवस्था में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।
🔅चौथा दिन कानूम पोंगल कहलाता है, जो सामाजिक और पारिवारिक समरसता का प्रतीक है। इस दिन लोग परिवार और मित्रों के साथ समय बिताते हैं, मंदिर दर्शन करते हैं, नदियों के किनारे जाते हैं और सामूहिक भोजन करते हैं। मनुस्मृति में सामाजिक एकता को धर्म का अंग बताया गया है, इसलिए यह दिन समाजिक संबंधों को मजबूत करने का अवसर माना जाता है।

💠पोंगल प्रसाद में प्रयुक्त चावल, दूध, गुड़ और घी केवल भोजन नहीं, बल्कि आध्यात्मिक प्रतीक हैं।
🔅चावल अन्नब्रह्म का,
🔅दूध शुद्धता का,
🔅गुड़ मधुरता का और
🔅घी यज्ञ शक्ति का प्रतीक माना जाता है।
यह सात्त्विक भोजन मन और शरीर दोनों को शुद्ध करता है। घरों के सामने बनाई जाने वाली कोलम नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने और देवी लक्ष्मी का स्वागत करने का प्रतीक मानी जाती है। तांत्रिक ग्रंथों में मंडल रचना को शक्तिपूजन का रूप बताया गया है।

💠पुराणों में सूर्योपासना का विशेष महत्व वर्णित है। स्कंद पुराण और भविष्य पुराण में सूर्य को विष्णु का तेज, शिव का नेत्र और ब्रह्मा का प्रकाश कहा गया है। सूर्य को नमस्कार करना वास्तव में सम्पूर्ण ब्रह्मांडीय ऊर्जा को प्रणाम करना है। पोंगल के माध्यम से मनुष्य यह स्वीकार करता है कि वह प्रकृति से अलग नहीं, बल्कि उसी का हिस्सा है।

💠पोंगल हमें यह सिखाता है कि अन्न का सम्मान करें, पशुओं की सेवा करें, प्रकृति की रक्षा करें और ईश्वर के प्रति कृतज्ञ रहें। यह पर्व कर्मयोग और भक्ति योग का सुंदर संगम है, जहाँ परिश्रम, श्रद्धा और कृतज्ञता एक साथ दिखाई देती है। आधुनिक समय में भी पोंगल हमें यह संदेश देता है कि विकास के साथ-साथ प्रकृति और परंपरा का संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। अंततः पोंगल केवल तमिलनाडु का पर्व नहीं, बल्कि सम्पूर्ण सनातन संस्कृति का गौरव है, जो सूर्य, अन्न, पशु और धरती के प्रति आभार व्यक्त करने का पावन अवसर प्रदान करता है।

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