Vitthala Temple Hampi सनातन धर्म और प्राचीन विज्ञान का शिलामय ग्रंथ

 

Vitthala Temple Hampi Architecture: सनातन हिंदू दर्शन और प्राचीन विज्ञान

कर्नाटक के हम्पी क्षेत्र में स्थित विट्ठल मंदिर भारतीय सभ्यता की उस गहरी और सतत परंपरा का साक्ष्य है, जिसमें इतिहास, मिथक, धर्म, दर्शन और विज्ञान एक-दूसरे से अलग नहीं, बल्कि एक ही चेतना के विविध रूप हैं। यह Vitthala Temple Hampi Architecture (विट्ठल मंदिर हम्पी की वास्तुकला) केवल विजयनगर साम्राज्य की स्थापत्य उपलब्धि नहीं है, बल्कि वह शिलामय ग्रंथ है जिसमें सनातन हिंदू चिंतन पत्थरों के माध्यम से अभिव्यक्त हुआ है।

तुंगभद्रा नदी के समीप स्थित यह क्षेत्र प्राचीन काल से ही पवित्र माना गया है और इसका उल्लेख रामायण, पुराणों तथा दक्षिण भारतीय परंपराओं में मिलता है। यहाँ का भूगोल स्वयं धार्मिक अर्थों से युक्त है, जहाँ पर्वत, नदी और भूमि को देवतत्त्व का विस्तार माना गया है।

Historical Roots of Vitthala Temple Hampi Architecture

रामायण के किष्किंधा कांड में जिस किष्किंधा नगरी का वर्णन मिलता है, वह इसी क्षेत्र से जुड़ी मानी जाती है। यही वह भूमि है जहाँ श्रीराम और हनुमान का मिलन हुआ, जहाँ सुग्रीव का राज्य स्थापित हुआ और जहाँ वानर सभ्यता का विकास हुआ। स्कंद पुराण और पद्म पुराण में तुंगभद्रा नदी को दक्षिण की गंगा कहा गया है। विट्ठल मंदिर इसी पवित्र भूगोल की चेतना से जन्मा हुआ स्थापत्य है।

भगवान विट्ठल, जिनकी उपासना इस मंदिर में की जाती थी, भगवान विष्णु के उस स्वरूप का प्रतिनिधित्व करते हैं जो भक्त के अत्यंत समीप है। उनका सीधा खड़ा हुआ स्वरूप, कमर पर टिके हाथ और शांत दृष्टि यह भाव व्यक्त करती है कि ईश्वर यहाँ किसी दूरस्थ लोक में नहीं, बल्कि मानव के जीवन में सक्रिय रूप से उपस्थित है। भारतीय इतिहास और संस्कृति की अधिक जानकारी के लिए आप Azaad Bharat की वेबसाइट पर जा सकते हैं。

Scientific Principles in Vitthala Temple Hampi Architecture

स्थापत्य की दृष्टि से विट्ठल मंदिर आगम शास्त्र, वास्तु शास्त्र और शिल्पशास्त्र के सिद्धांतों पर आधारित है। मंदिर निर्माण से पूर्व भूमि की सूक्ष्म परीक्षा की जाती थी, जिसमें भूमि की ध्वनि, जलधारण क्षमता, ऊर्जा प्रवाह और पंचतत्वों के संतुलन का परीक्षण किया जाता था। इसके पश्चात पूरे परिसर की योजना वास्तु पुरुष मंडल के अनुसार बनाई गई, जिसमें गर्भगृह को ब्रह्मस्थान माना गया।

गर्भगृह का संकुचित और अंधकारयुक्त स्वरूप हिरण्यगर्भ सिद्धांत से जुड़ा हुआ है। उपनिषदों में वर्णित इस सिद्धांत के अनुसार सृष्टि का उद्गम अंधकार से होता है और वहीं से प्रकाश का प्राकट्य होता है। गर्भगृह में प्रवेश करते समय साधक का अहंकार स्वतः क्षीण होता है और वह बाह्य प्रकाश से हटकर आंतरिक चेतना की ओर उन्मुख होता है।

Musical Pillars and Vitthala Temple Hampi Architecture

विट्ठल मंदिर का महामंडप अपने संगीत स्तंभों के कारण अद्वितीय है। ये स्तंभ केवल कलात्मक अलंकरण नहीं, बल्कि सामवेद की नाद परंपरा की स्थापत्य अभिव्यक्ति हैं। सामवेद में ध्वनि को ब्रह्म का स्वरूप माना गया है और यहाँ के स्तंभ उसी नाद ब्रह्म को पत्थर में साकार करते हैं।

प्रत्येक स्तंभ से उत्पन्न होने वाली भिन्न ध्वनियाँ यह सिद्ध करती हैं कि उस काल के शिल्पकार ध्वनिविज्ञान, कंपन सिद्धांत और पत्थर की आंतरिक संरचना के सूक्ष्म ज्ञान से परिचित थे। यह Vitthala Temple Hampi Architecture का प्रमाण है कि प्राचीन भारत में विज्ञान और आध्यात्मिकता एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक ही सत्य की दो अभिव्यक्तियाँ थीं。

Philosophy of the Stone Chariot

मंदिर परिसर में स्थित प्रसिद्ध पत्थर का रथ भी गहन दार्शनिक अर्थ रखता है। यह गरुड़ को समर्पित है, जो भगवान विष्णु का वाहन है। ऋग्वेद में सूर्य को रथारूढ़ बताया गया है और रथ को गति तथा काल का प्रतीक माना गया है। इस रथ के पहिए कालचक्र का संकेत देते हैं और यह संदेश देते हैं कि धर्म स्थिर नहीं, बल्कि समय के साथ गतिमान रहते हुए भी अपने मूल सिद्धांतों में अडिग रहता है। पत्थर जैसे स्थिर माध्यम में गति का भाव उत्पन्न करना प्राचीन भारतीय स्थापत्य की असाधारण कल्पनाशीलता को दर्शाता है।

निष्कर्ष

1565 ईस्वी में तालीकोटा के युद्ध के पश्चात विजयनगर साम्राज्य का पतन हुआ और हम्पी नगर उजड़ गया, किंतु विट्ठल मंदिर पूर्णतः नष्ट नहीं हुआ। विट्ठल मंदिर इसलिए महत्त्वपूर्ण नहीं है कि वह अतीत का अवशेष है, बल्कि इसलिए कि वह आज भी भारतीय चेतना को उसके मूल से जोड़ता है। यह स्मरण कराता है कि सनातन धर्म केवल ग्रंथों में नहीं, बल्कि पत्थरों में भी जीवित है।