🌼 Vasant में आयुर्वेदिक स्वास्थ्य-देखभाल : ऋतुचर्या का सम्पूर्ण मार्गदर्शन
भारतीय संस्कृति में वसंत को ऋतुराज कहा गया है। यह ऋतु शीतकाल की ठिठुरन के बाद आती है और ग्रीष्म की तीव्रता से पहले का मधुर, संतुलित और मनभावन समय लेकर आती है। प्रकृति में चारों ओर नवजीवन दिखाई देता है—वृक्षों पर कोमल पत्तियाँ, रंग-बिरंगे पुष्प, खेतों में लहराती फसलें और वातावरण में सुगंधित समीर। परंतु आयुर्वेद के अनुसार यह केवल आनंद का मौसम नहीं, बल्कि शरीर के भीतर होने वाले सूक्ष्म परिवर्तनों को समझने का भी समय है। सर्दियों में जो कफ शरीर में संचित हो जाता है, वसंत की उष्णता पाकर वह द्रवित होने लगता है। यही द्रवित कफ यदि संतुलित न किया जाए तो सर्दी, खाँसी, एलर्जी, त्वचा विकार, आलस्य और पाचन संबंधी परेशानियाँ उत्पन्न कर सकता है। इसलिए आयुर्वेद वसंत को शुद्धि और संतुलन स्थापित करने की सर्वश्रेष्ठ ऋतु मानता है।
इस समय पाचन अग्नि अपेक्षाकृत मंद हो सकती है और व्यक्ति को भारीपन या अधिक नींद का अनुभव हो सकता है। ऐसे में सक्रिय जीवनशैली अत्यंत आवश्यक है। प्रातःकाल शीघ्र उठना, गुनगुना जल पीना और शरीर को गतिशील बनाना लाभकारी माना गया है। नियमित व्यायाम, तेज चलना, सूर्य नमस्कार और योगासन जड़ता को दूर कर शरीर में स्फूर्ति लाते हैं। प्राणायाम, विशेषकर कपालभाति और भस्त्रिका, श्वसन तंत्र को स्वच्छ रखने और कफ को संतुलित करने में सहायक माने जाते हैं। दिन में सोना आयुर्वेद के अनुसार कफ को बढ़ा सकता है, इसलिए इससे बचना उचित बताया गया है।
वसंत ऋतु में आहार संबंधी अनुशासन का विशेष महत्व है। हल्का, सुपाच्य, कम तैलीय और संतुलित भोजन करना चाहिए। जौ, पुराना गेहूँ, मूंग, मसूर और हरी सब्जियाँ पाचन को सहारा देती हैं। कड़वे, तीखे और कषाय स्वाद वाले पदार्थ कफ शमन में उपयोगी माने गए हैं। इसके विपरीत अत्यधिक मीठा, खट्टा, ठंडा, दही, तले हुए या बहुत चिकने पदार्थ कम मात्रा में लेने चाहिए। सीमित मात्रा में शहद का सेवन परंपरागत रूप से हितकर बताया गया है। उद्देश्य यही है कि भोजन शरीर को ऊर्जा दे, परंतु बोझ न बने।
आयुर्वेद बाहरी शुद्धि पर भी उतना ही बल देता है जितना आंतरिक संतुलन पर। इस ऋतु में तेल से मालिश, जिसे अभ्यंग कहा जाता है, शरीर को सक्रिय बनाती है और रक्तसंचार को प्रोत्साहित करती है। चूर्ण से की जाने वाली मालिश, अर्थात उद्वर्तन, त्वचा को स्वच्छ रखने और अतिरिक्त कफ व मेद को कम करने में सहायक मानी जाती है। स्नान के बाद व्यक्ति ताजगी और हल्कापन अनुभव करता है, जिससे पूरे दिन कार्य करने की क्षमता बढ़ती है।
वसंत में कुछ पारंपरिक जड़ी-बूटियों का उपयोग भी प्रचलित रहा है। नीम को रक्त और त्वचा की शुद्धि के लिए, गिलोय को रोग प्रतिरोधक क्षमता के समर्थन हेतु, हल्दी को सूजनरोधी गुणों के कारण और तुलसी को श्वसन स्वास्थ्य के लिए उपयोगी माना गया है। फिर भी आयुर्वेद यह स्पष्ट करता है कि प्रत्येक व्यक्ति की प्रकृति भिन्न होती है, इसलिए किसी भी औषधि या काढ़े का नियमित प्रयोग करने से पहले योग्य चिकित्सक की सलाह लेना आवश्यक है।
यह ऋतु मानसिक प्रसन्नता का भी संदेश देती है। सूर्य का प्रकाश बढ़ने, हरियाली फैलने और वातावरण के सुहावने होने से मन में सकारात्मकता आती है। जब व्यक्ति संयमित भोजन, नियमित व्यायाम और संतुलित दिनचर्या अपनाता है, तो उसका आत्मविश्वास और कार्यक्षमता दोनों बढ़ते हैं। इस प्रकार वसंत केवल शरीर को नहीं, बल्कि मन और जीवन दृष्टि को भी नवीनता प्रदान करता है।
अंत में कहा जा सकता है कि वसंत हमें प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करने की प्रेरणा देता है। यदि इस समय हम कफ संतुलन, शुद्ध आहार, योग-प्राणायाम और उचित दिनचर्या अपनाएँ, तो पूरे वर्ष अच्छे स्वास्थ्य की मजबूत नींव रखी जा सकती है। वसंत वास्तव में नवजीवन, ऊर्जा, संतुलन और आशा का उत्सव है 🌼।
