
Somnath Jyotirlinga History: शिव के अनंत प्रकाश का प्रथम स्थिर रूप
सनातन हिंदू परंपरा में यदि किसी एक स्थान को ज्योतिर्लिंग परंपरा का मूल स्रोत कहा जाए, तो वह सोमनाथ है। शिवपुराण, स्कंदपुराण और लोकपरंपरा—तीनों में सोमनाथ को प्रथम ज्योतिर्लिंग माना गया है। Somnath Jyotirlinga History (सोमनाथ ज्योतिर्लिंग का इतिहास) केवल क्रम का सूचक नहीं, बल्कि अर्थ का भी सूचक है, क्योंकि यहीं पहली बार शिव ने यह स्पष्ट किया कि अहंकार चाहे देवता का हो या मनुष्य का, उसका क्षय निश्चित है और शरण से ही पुनः संतुलन संभव है।
सोमनाथ की कथा किसी मंदिर या स्थापत्य की कथा नहीं है। यह मन, समय, धर्म और सृष्टि के संतुलन की कथा है। भारतीय संस्कृति और तीर्थों की अधिक जानकारी के लिए आप Azaad Bharat की वेबसाइट पर जा सकते हैं。
Mythological Origins of Somnath Jyotirlinga History
पुराणों में वर्णित है कि दक्ष प्रजापति की 27 कन्याएँ थीं, जिन्हें नक्षत्र कहा गया। ये नक्षत्र केवल आकाशीय पिंड नहीं, बल्कि समय के सूक्ष्म चरण हैं। चंद्रमा, जिन्हें वेदों में सोम कहा गया है, इन 27 नक्षत्रों से विवाहित थे। सोम को मन, औषधि, रस और समय का स्वामी माना गया है। प्रारंभ में सब कुछ संतुलित था, पर धीरे-धीरे चंद्रमा का मन केवल एक नक्षत्र—रोहिणी—में आसक्त हो गया। यह प्रेम नहीं, बल्कि आसक्ति और पक्षपात था。
जब मन (चंद्रमा) धर्म से हटकर एक ही विषय में फँस जाता है, तो उसका प्रभाव केवल व्यक्तिगत नहीं रहता; पूरी सृष्टि प्रभावित होती है। दक्ष प्रजापति ने पहले चंद्रमा को समझाया, चेताया, पर जब धर्म की मर्यादा भंग होती रही, तब उन्होंने श्राप दिया कि चंद्रमा क्षीण होता जाएगा। यह श्राप किसी क्रोध का परिणाम नहीं था, बल्कि धर्म का विधान था。
The Cosmic Crisis and Shiva’s Intervention
चंद्रमा के क्षीण होते ही सृष्टि में असंतुलन उत्पन्न हो गया। औषधियाँ प्रभावहीन होने लगीं, वनस्पति सूखने लगी, जलचक्र प्रभावित हुआ और जीवों का मन अस्थिर होने लगा। देवताओं को तब यह बोध हुआ कि यह केवल एक ग्रह की समस्या नहीं, बल्कि सृष्टि का संकट है। सभी देवता ब्रह्मा के नेतृत्व में शिव के पास पहुँचे, पर शिव ने कोई तात्कालिक समाधान नहीं दिया। शिवपुराण में संकेत है कि शिव ने केवल इतना कहा कि जिसे उद्धार चाहिए, उसे स्वयं शरण लेनी होगी。
चंद्रमा ने तब अपना वैभव, गर्व और अहंकार त्यागकर प्रभास क्षेत्र में शिव की आराधना प्रारंभ की। वर्षों तक उन्होंने न अन्न ग्रहण किया, न जल—केवल शिव नाम का जप और पूर्ण आत्मसमर्पण। यह वही क्षण था जब देवता भी साधक बन गया। जब मन ने स्वयं को दोषी स्वीकार किया, तभी भक्ति ने जन्म लिया。
Restoration and Significance in Somnath Jyotirlinga History
अंततः शिव प्रकट हुए। उन्होंने दक्ष के श्राप को असत्य नहीं ठहराया, क्योंकि वह धर्म से उत्पन्न था। शिव ने कहा कि वे नियम नहीं तोड़ते, पर संतुलन प्रदान करते हैं। उन्होंने चंद्रमा को क्षय और वृद्धि का चक्र दिया—अमावस्या और पूर्णिमा। इसी संतुलन से सृष्टि पुनः स्थिर हुई। उसी क्षण, उसी स्थान पर शिव स्वयं ज्योति के रूप में स्थिर हुए। यह कोई साधारण शिवलिंग नहीं था, बल्कि चेतना का प्रकाश था। चंद्रमा के स्वामी होने के कारण शिव यहाँ सोमनाथ कहलाए—सोम के नाथ。
वेदों में सोम को यज्ञ का रस कहा गया है। जब सोम शुद्ध होता है, तब यज्ञ सफल होता है। इसी प्रकार जब मन शिव में स्थित होता है, तब जीवन यज्ञ बन जाता है। सोमनाथ इसीलिए केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक शुद्धि का केंद्र है。
Resilience of Eternal Light
इतिहास के कालखंड में सोमनाथ मंदिर पर अनेक आक्रमण हुए। उसे बार-बार तोड़ा गया, जलाया गया, पर हर बार उसका पुनर्निर्माण हुआ। यह केवल स्थापत्य का पुनर्निर्माण नहीं था, बल्कि सनातन चेतना की पुनर्स्थापना थी। क्योंकि ज्योतिर्लिंग पत्थर में नहीं, चेतना में स्थित होता है। आज भी सोमनाथ अरब सागर के तट पर खड़ा होकर यही संदेश देता है कि लहरें आती-जाती रहती हैं, पर प्रकाश स्थिर रहता है。
Conclusion
जब मन पक्षपात, आसक्ति और अहंकार में फँसता है, तब वह क्षीण होता है। जब वही मन शिव में शरण लेता है, तब वह पुनः पूर्ण होता है। सोमनाथ इसलिए प्रथम है, क्योंकि यहीं पहली बार यह सत्य प्रकट हुआ कि शिव को पाया नहीं जाता, शिव में स्थित हुआ जाता है। यही ज्योतिर्लिंग परंपरा का मूल संदेश है। हर हर महादेव。