
Panchang vs Calendar: समय-गणना नहीं, संस्कृति का परिवर्तन
प्राचीन भारत में पंचांग केवल तिथियों का संग्रह नहीं था, बल्कि जीवन जीने की एक पद्धति था। हर घर में पंचांग होता था, क्योंकि वही बताता था — कौन-सा दिन शुभ है, कब संयम रखना है, कब उत्सव मनाना है। पंचांग मनुष्य को प्रकृति, ऋतु, चंद्रमा, सूर्य और धर्म — इन सब से जोड़कर जीवन का मार्ग दिखाता था।
History and Origin: Panchang vs Calendar
आज जिसे हम अंग्रेजी कैलेंडर कहते हैं, उसकी जड़ें रोमन सभ्यता में हैं। बाद में इसे ईसाई धर्म के अनुरूप ढालकर ग्रेगोरियन कैलेंडर बनाया गया। इसकी गणना ईसा मसीह के जन्म को केंद्र में रखकर की गई। यह कैलेंडर कृषि, ऋतु और धर्म के लिए नहीं, बल्कि प्रशासन, कर व्यवस्था और सत्ता संचालन के लिए बनाया गया था। भारत में इसका प्रवेश ब्रिटिश शासनकाल के दौरान हुआ।
कारण स्पष्ट था — जिस राष्ट्र की समय-गणना बदल दी जाए, उसकी सोच, संस्कार और पहचान भी धीरे-धीरे बदल जाती है।
जब तिथियाँ हमारी, पर महीने विदेशी
आज हमारे तथाकथित “हिंदू कैलेंडर” में तिथि तो पंचांग की होती है — एकादशी, द्वादशी, अमावस्या — लेकिन महीनों के नाम जनवरी, फरवरी, मार्च रख दिए गए हैं। यह एक मानसिक द्वंद्व है — संस्कृति पंचांग की, पर पहचान अंग्रेजी। धीरे-धीरे यह भावना गहराती गई कि — “अंग्रेजी महीना आधुनिक है, पंचांग पुराना।” यहीं से संस्कृति को पिछड़ा और पश्चिम को प्रगतिशील बताने का खेल शुरू हुआ।
साल की गणना: हमारी संवत क्यों भूले?
भारत में विक्रम संवत, शक संवत, कलियुग संवत जैसी अनेक वैज्ञानिक और सटीक समय-गणनाएँ प्रचलित थीं। लेकिन अंग्रेजों ने प्रशासन, शिक्षा और कानून में ईस्वी सन को अनिवार्य कर दिया। आज स्थिति यह है कि — हम जन्मदिन अंग्रेजी तारीख को मनाते हैं, नया साल 1 जनवरी को मानते हैं, और हिंदू नववर्ष को भूल चुके हैं। यह परिवर्तन संयोग नहीं, बल्कि सांस्कृतिक दिशा बदलने का परिणाम है।
Cultural Impact of Panchang vs Calendar
इस परिवर्तन के दुष्परिणाम स्पष्ट हैं, जो समाज को संयम से उच्छृंखलता तक ले गए हैं। आज का दृश्य देखिए:
- 31 दिसंबर 2025: पंचांग के अनुसार — एकादशी, संयम, व्रत, आत्मशुद्धि का दिन।
- 1 जनवरी 2026: द्वादशी, भगवान विष्णु का स्मरण और सात्विक जीवन का संदेश।
लेकिन वास्तविकता क्या है?
अंग्रेजी कैलेंडर और पाश्चात्य प्रभाव में पली युवा पीढ़ी — नशे में धुत, पार्टियों में मग्न, संयम को “बोरिंग” और उच्छृंखलता को “एंजॉयमेंट” मानती है। यह केवल युवाओं का दोष नहीं है।
असली दोषी कौन?
- क्या यह व्यवस्था का दोष है?
- क्या यह सही मार्गदर्शन और जानकारी का अभाव है?
- या फिर कैलेंडर के नाम पर हिंदुओं के साथ खेला गया सुनियोजित षड्यंत्र?
सत्य यह है कि जब समय की दिशा बदल दी जाती है, तब संस्कार भी भटक जाते हैं। पंचांग हमें संयम सिखाता है, जबकि कैलेंडर केवल तारीख बताता है। भारतीय संस्कृति और काल गणना के बारे में अधिक जानने के लिए आप Azaad Bharat की वेबसाइट देख सकते हैं।
Solution for the Panchang vs Calendar Dilemma
समाधान कैलेंडर फाड़ने में नहीं, बल्कि चेतना जगाने में है। हम अंग्रेजी कैलेंडर का उपयोग करें, पर उसकी पूजा न करें, हिंदू नववर्ष को गौरव से मनाएँ, बच्चों को तिथि, नक्षत्र, व्रत का अर्थ समझाएँ। और यह सदा याद रखें — “कैलेंडर बदला जा सकता है, संस्कृति नहीं।”
निष्कर्ष: समय को दिशा देने वाली संस्कृति
सनातन संस्कृति समय से नहीं चलती, वह समय को दिशा देती है। यदि आज भी पंचांग को समझ लिया जाए, तो नई पीढ़ी नशे में नहीं, बल्कि निष्ठा में डूबी दिखाई देगी। अब निर्णय हमारा है — हम केवल तारीख बदलेंगे, या अपनी सांस्कृतिक चेतना भी वापस लाएँगे।
कैलेंडर बदले, संस्कृति नहीं
कभी हर हिंदू घर में पंचांग होता था—वह केवल तिथियाँ नहीं बताता था, बल्कि संयम, संस्कार और सही समय सिखाता था। आज तिथि तो एकादशी–द्वादशी की है, लेकिन महीना जनवरी लिखा है। संस्कृति पंचांग की, पर पहचान अंग्रेजी कैलेंडर की।
31 दिसंबर 2025 का उदाहरण:
- पंचांग कहता है एकादशी, संयम, साधना, आत्मशुद्धि।
- लेकिन पश्चिमी कैलेंडर कहता है — न्यू ईयर ईव, नशा, उन्माद, उच्छृंखलता।
दोष युवाओं का नहीं, दोष उस व्यवस्था का है, जिसने समय की गणना बदलकर संस्कार बदल दिए। अंग्रेजी कैलेंडर सुविधा है, पर संस्कृति नहीं। सनातन पंचांग जीवन, नियम, मर्यादा और दिशा है। अंग्रेजी तारीख चल सकती है, लेकिन संस्कृति की जगह नहीं ले सकती।
याद रखें:
कैलेंडर बदला जा सकता है, संस्कृति नहीं। हिंदू नववर्ष को अपनाइए, पंचांग को समझिए, और आने वाली पीढ़ी को जड़ों से जोड़िए। जय सनातन। जय पंचांग।