Back to Roots: प्रकृति की ओर लौटता मानव और आधुनिक भ्रम
हमारे बुज़ुर्ग वैज्ञानिक रूप से बहुत आगे थे। यह वाक्य अब केवल एक भावुक स्मृति नहीं है। बल्कि, यह ठोस अनुभव और शोध से उपजा हुआ सत्य बनता जा रहा है। आधुनिक मानव ने “प्रगति” को आँख मूँदकर अपनाया था।
अब वह इसके दुष्परिणामों से जूझ रहा है। इसलिए, वह आज फिर उसी पथ पर लौट रहा है। इसे कभी पिछड़ा या अवैज्ञानिक कहकर छोड़ दिया गया था। वास्तव में, टेक्नोलॉजी ने हमें बहुत कुछ दिया। लेकिन, प्रकृति ने उससे बेहतर पहले से दे रखा था। बस फर्क इतना है कि हमने उसे समझा नहीं, बल्कि नकार दिया।
Why Society is Moving Back to Roots?
नीचे दिए गए उदाहरण केवल सामाजिक बदलाव नहीं हैं। ये मानव सभ्यता की सोच में आए उतार–चढ़ाव की कहानी कहते हैं। यह लेख उन्हीं बिंदुओं को विस्तार से समझाता है। यहाँ हम इसके वैज्ञानिक और सामाजिक पक्ष को देखेंगे।
मिट्टी के बर्तन बनाम प्लास्टिक
कभी हर रसोई में मिट्टी के घड़े और हांडी होते थे। इसमें पानी ठंडा रहता था। साथ ही, भोजन में प्राकृतिक स्वाद बना रहता था। शरीर को हानिकारक रसायनों का डर नहीं था। फिर स्टील आया जो चमकदार और टिकाऊ था।
इसके बाद, प्लास्टिक ने सुविधा के नाम पर हर जगह कब्ज़ा कर लिया। आज शोध बता रहे हैं कि प्लास्टिक खतरनाक है। इससे माइक्रोप्लास्टिक्स और केमिकल्स निकलते हैं। ये कैंसर और हार्मोनल असंतुलन का कारण बन सकते हैं। इसलिए, समाज फिर से मिट्टी के बर्तनों की ओर लौट रहा है। यह वापसी फैशन नहीं है। यह स्वास्थ्य की विवशता है।
डिजिटल अंगूठा छाप (Biometrics)
एक समय था जब अंगूठा छाप पहचान का प्रमाण था। फिर शिक्षित समाज ने दस्तखतों को प्रतिष्ठा का प्रतीक बना लिया। अब डिजिटल युग आ गया है। बायोमेट्रिक तकनीक हमें फिर अंगूठे पर ले आई है।
बस फर्क इतना है कि अब स्याही नहीं, स्कैनर है। यह बदलाव एक बात साफ़ करता है। तकनीक भी अंततः उसी प्राकृतिक पहचान प्रणाली की ओर लौटती है। हमारे पूर्वज इसे सहज रूप से अपनाते थे।
सादा कपड़ों से फटी जींस तक
कभी सादा जीवन उच्च विचार का सिद्धांत था। फिर औद्योगिक युग आया। इसने साफ-सुथरे कपड़ों को सभ्यता का मानक बना दिया। आज फैशन के नाम पर फटी जींस बिक रही है। वह भी महँगे दामों पर। यह विरोधाभास बताता है कि आधुनिकता कई बार तर्क नहीं देखती। यह केवल ट्रेंड का अनुसरण करती है, चाहे वह बेमानी क्यों न हो।
सूती और सिंथेटिक कपड़े
सूती कपड़े शरीर को सांस लेने देते हैं। ये पसीना सोखते हैं और त्वचा के अनुकूल होते हैं। फिर सिंथेटिक कपड़े आए। ये चमकदार थे और जल्दी सूखते थे। कुछ दशकों बाद लोगों को दिक्कतें होने लगीं।
एलर्जी और स्किन प्रॉब्लम्स बढ़ गईं। नतीजतन, वही लोग “ऑर्गेनिक कॉटन” की तलाश में निकल पड़े। यह स्पष्ट करता है कि प्रकृति-अनुकूल वस्तुएँ ही लाभ देती हैं।
MBA से ऑर्गेनिक खेती (Organic Farming)
कभी खेती को मेहनत-भरा माना जाता था। इसे कम प्रतिष्ठित समझा जाता था। पढ़-लिखकर कॉरपोरेट दुनिया में जाना सफलता थी। आज वही शिक्षित युवा वापस आ रहे हैं। वे मल्टीनेशनल कंपनियों में काम कर चुके हैं।
मानसिक तनाव से तंग आकर वे फिर मिट्टी से जुड़ रहे हैं। वे ऑर्गेनिक फार्मिंग और सस्टेनेबल बिज़नेस अपना रहे हैं। यह लौटना हार नहीं है। यह समझदारी का संकेत है।
प्रोसेस्ड फूड से कुदरती भोजन
घर का ताज़ा खाना कभी सामान्य जीवन का हिस्सा था। फिर डिब्बाबंद भोजन और पैक्ड जूस आ गए। इसने समय बचाने के नाम पर स्वास्थ्य छीन लिया। मोटापा और हृदय रोग बढ़ने लगे।
इसलिए, “नेचुरल” और “होम-मेड” फिर से मूल्यवान बन गए। यह परिवर्तन दिखाता है कि सुविधा हमेशा कल्याण नहीं होती। स्वास्थ्य से जुड़ी ऐसी और जानकारी के लिए आप Azaad Bharat की वेबसाइट देख सकते हैं।
ब्रांडेड और एंटीक (Antiques)
ब्रांडेड वस्तुएँ कभी स्टेटस सिंबल थीं। समय के साथ उनकी नीरसता सामने आई। अब वही लोग एंटीक फर्नीचर और हस्तशिल्प खोज रहे हैं। वे इसमें आत्मिक संतोष पाते हैं। यह साबित करता है कि मूल्य टैग से नहीं, बल्कि भावनाओं से तय होता है।
इम्युनिटी और मिट्टी का खेल
स्वच्छता के नाम पर बच्चों को प्रकृति से दूर कर दिया गया। इसका परिणाम बुरा हुआ। उनकी इम्युनिटी कमज़ोर हो गई। वे स्क्रीन-आधारित जीवन जीने लगे। अब वही अभिभावक “मड थेरेपी” की बात कर रहे हैं। प्रकृति से दूरी ने जो छीना, वही प्रकृति वापस दे रही है।
शहर के शोर से जंगल की शांति
शहरों की चकाचौंध ने कुछ समय तक आकर्षित किया। लेकिन, शोर और प्रदूषण ने मन को थका दिया। आज “रूरल रिट्रीट” और “फॉरेस्ट स्टे” लोकप्रिय हो रहे हैं। यह बदलाव बताता है कि शांति का कोई विकल्प नहीं है।
Conclusion: The Science Behind Going Back to Roots
इन सभी उदाहरणों से एक ही निष्कर्ष निकलता है। टेक्नोलॉजी ने जो दिया, उससे बेहतर प्रकृति ने पहले से दे रखा था। तकनीक तब सार्थक है जब वह प्रकृति के साथ हो। हमारे बुज़ुर्गों की जीवनशैली अज्ञान नहीं थी। वह अनुभवजन्य विज्ञान पर आधारित थी।
आज आवश्यकता है उस ज्ञान को अपनाने की। हमें इसे अंधविश्वास कहकर खारिज नहीं करना चाहिए। यदि मानव ने यह संतुलन नहीं समझा, तो भविष्य कष्टदायक हो सकता है। सही प्रगति वही है जो प्रकृति के साथ चले। यही असली Back to Roots का सिद्धांत है।
