The Divine Mystery of the Origin of Elements by Kapil Rishi
भारतीय दर्शन में सृष्टि की उत्पत्ति, आत्मा का स्वरूप और बंधन-मोक्ष का विज्ञान अत्यंत गहन रूप से वर्णित है। श्रीमद्भागवत महापुराण में भगवान कपिल द्वारा अपनी माता देवहूति को दिया गया ज्ञान इस विषय का अद्भुत उदाहरण है। इस उपदेश में उन्होंने प्रकृति, पुरुष, माया, अहंकार, मन और 24 तत्त्वों की उत्पत्ति का रहस्य स्पष्ट किया है। Origin of Elements by Kapil Rishi (कपिल ऋषि द्वारा तत्त्वों की उत्पत्ति) का यह सिद्धांत हमें आत्मज्ञान की ओर ले जाता है।
Salvation through Self-Knowledge in the Origin of Elements by Kapil Rishi
भगवान कपिल कहते हैं कि जब तक मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप — अर्थात आत्मा — को नहीं पहचानता, तब तक वह संसार के मोह में फँसा रहता है। विद्वानों का मत है कि आत्मज्ञान से ही अहंकार की गांठ खुलती है और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। यह सम्पूर्ण जगत जिस चेतना से प्रकाशित है, वही ‘पुरुष’ या आत्मा है। वह न जन्म लेती है, न मरती है। उसमें कोई दोष, कोई गुण नहीं होता। वह प्रकृति से अलग, स्वयंप्रकाश और शुद्ध चेतना स्वरूप है।
उस परम पुरुष ने अपनी इच्छा से गुणमयी माया को स्वीकार किया। इस माया में तीन गुण हैं — सत्त्व, रज और तम। जब प्रकृति ने इन गुणों के माध्यम से सृष्टि की रचना की, तब जीव माया के प्रभाव में आकर अपने असली स्वरूप को भूल गया। उसने स्वयं को प्रकृति के कर्मों का कर्ता मान लिया। यही अहंकार उसे जन्म-मरण के बंधन में बाँध देता है। वास्तव में आत्मा निर्दोष और स्वतंत्र है, पर शरीर और इन्द्रियों से अपनी पहचान जोड़ लेने के कारण वह सुख-दुःख भोगने को विवश हो जाती है।
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Understanding the 24 Tattvas in the Origin of Elements by Kapil Rishi
भगवान कपिल ने सृष्टि के भौतिक और सूक्ष्म तत्वों को 24 तत्त्वों में विभाजित किया है:
- पंचमहाभूत: पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश
- पंच तन्मात्राएँ: गंध, रस, रूप, स्पर्श, शब्द
- दस इन्द्रियाँ:
- ज्ञानेंद्रियाँ: कान, त्वचा, आँख, जीभ, नाक
- कर्मेंद्रियाँ: वाणी, हाथ, पैर, उपस्थ, पायु
- अंतःकरण: मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार
इन सभी के अतिरिक्त 25वाँ तत्त्व ‘काल’ है। यही काल प्रकृति के गुणों में गति लाता है और सृष्टि का विस्तार करता है। जो लोग शरीर को ही आत्मा मानते हैं, वे काल से भयभीत रहते हैं। भगवान भीतर प्राण रूप में और बाहर काल रूप में विराजमान हैं।
Mahat Tattva and Ego in the Origin of Elements by Kapil Rishi
जब भगवान ने माया में अपनी शक्ति प्रवाहित की, तब सबसे पहले महत् तत्त्व की उत्पत्ति हुई। यह पूर्णतः शुद्ध, शांत और प्रकाशमय है, जिसे ‘वासुदेव’ कहा गया है। जैसे शुद्ध जल बिना विकार के शांत रहता है, वैसे ही हमारी चेतना भी मूल रूप में निर्मल होती है। जब इस महत् तत्त्व में विकार आया, तब उससे अहंकार उत्पन्न हुआ।
अहंकार तीन प्रकार का होता है:
- सात्त्विक (वैकारिक): इससे मन की उत्पत्ति होती है।
- राजस (तैजस): इससे इन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं।
- तामस: इससे पंचमहाभूतों की उत्पत्ति होती है।
विद्वान इस अहंकार को संकर्षण कहते हैं।
Role of Mind and Sadhana
सात्त्विक अहंकार से मन उत्पन्न हुआ। मन का कार्य है संकल्प-विकल्प करना, अर्थात “करूँ या न करूँ” का निर्णय लेना। यहीं से इच्छाएँ जन्म लेती हैं और यहीं से बंधन भी। मन के अधिष्ठाता देवता भगवान अनिरुद्ध हैं, जिनका स्वरूप नीलकमल के समान श्याम है। योग साधना द्वारा मन को नियंत्रित कर साधक अनिरुद्ध भगवान का ध्यान करता है और धीरे-धीरे आत्मज्ञान की ओर अग्रसर होता है।
निष्कर्ष
भगवान कपिल का यह उपदेश केवल सृष्टि की उत्पत्ति की कथा नहीं, बल्कि आत्ममुक्ति का मार्ग भी है। यह हमें सिखाता है कि:
- आत्मा शरीर नहीं है।
- अहंकार ही बंधन का कारण है।
- मन को नियंत्रित करना ही मुक्ति की कुंजी है।
- आत्मज्ञान से ही सच्ची स्वतंत्रता मिलती है।
आज के भौतिक युग में भी यह दर्शन उतना ही प्रासंगिक है, जितना प्राचीन काल में था।
