Nageshwar Jyotirlinga : भय और विष से मुक्ति का धाम

Nageshwar Jyotirlinga History: जहाँ शिव विष, भय और अहंकार को अपने अधीन कर भक्तों को निर्भय बनाते हैं

द्वादश ज्योतिर्लिंगों की परंपरा में नागेश्वर वह तीर्थ है जहाँ शिव रक्षक के रूप में नहीं, बल्कि निर्भयता के दाता के रूप में प्रकट होते हैं। यह स्थल शिवपुराण और स्कंदपुराण में उस ज्योति के रूप में वर्णित है जो सर्प—अर्थात विष, भय और अहंकार—को अपने नियंत्रण में रखती है। Nageshwar Jyotirlinga History (नागेश्वर ज्योतिर्लिंग का इतिहास) हमें यह समझाता है कि शिव केवल संकट से बाहर नहीं निकालते, बल्कि भीतर जमे भय को भी मूल से काट देते हैं。

Mythological Origins of Nageshwar Jyotirlinga History

शिवपुराण में वर्णन आता है कि दारुक नामक एक राक्षस और उसकी पत्नी दारुका ने घोर तप से अद्भुत शक्तियाँ प्राप्त कर ली थीं। दारुका को यह वरदान मिला कि उसका साम्राज्य समुद्र के मध्य सुरक्षित रहेगा। इस वरदान के अहंकार में दारुक ने साधुओं और शिवभक्तों को बंदी बनाना आरंभ कर दिया। उसका उद्देश्य केवल शासन नहीं था, बल्कि भक्ति को भय में बदल देना था। बंदी बनाए गए साधुओं में सुप्रिया नामक एक महान शिवभक्त भी थे, जो कारागार में रहते हुए भी निरंतर शिव-नाम का जप करते रहे। उनके जप से कारागार की दीवारें तक कंपन करने लगीं। भारतीय तीर्थों और संस्कृति की अधिक जानकारी के लिए आप Azaad Bharat की वेबसाइट पर जा सकते हैं。

Shiva’s Manifestation as Nageshwar

जब सुप्रिया की भक्ति ने दारुक के अत्याचार को चुनौती दी, तब दारुक ने उन्हें मारने का निश्चय किया। उसी क्षण शिव ने हस्तक्षेप किया। शिवपुराण कहता है कि शिव नाग रूप धारण कर प्रकट हुए। सर्प यहाँ केवल रूप नहीं, प्रतीक है—वह भय, विष और मृत्यु का प्रतीक है। शिव ने उसी प्रतीक को अपने अधीन कर दिखाया। दारुक का संहार हुआ और बंदी शिवभक्त मुक्त हुए। उसी स्थान पर शिव ज्योति के रूप में स्थिर हुए और नागेश्वर कहलाए—अर्थात नागों के भी ईश्वर。

Vedic Symbolism in Nageshwar Jyotirlinga History

वेदों में रुद्र को नागभूषण कहा गया है। सर्प शिव के गले का आभूषण है, क्योंकि जो भय का कारण बनता है, वही शिव के लिए अलंकार है। नागेश्वर ज्योतिर्लिंग इसी वैदिक सत्य को मूर्त करता है। यहाँ शिव यह सिखाते हैं कि भय से लड़ने का मार्ग उसे दबाना नहीं, बल्कि उस पर अधिकार प्राप्त करना है। जो शिव में स्थित हो जाता है, उसके लिए विष भी औषधि बन जाता है。

स्कंदपुराण में इस क्षेत्र को शिवभक्तों की रक्षा-भूमि कहा गया है। द्वारका के समीप स्थित यह तटीय क्षेत्र संकेत देता है कि जैसे समुद्र की लहरें निरंतर उठती-गिरती रहती हैं, वैसे ही जीवन में भय आते-जाते रहते हैं। पर जो व्यक्ति अपने भीतर शिव-तत्त्व को स्थिर कर लेता है, वह इन लहरों से विचलित नहीं होता। नागेश्वर का शिवलिंग इसी स्थिरता का प्रतीक है。

Internal Fear and Spiritual Liberation

आध्यात्मिक तत्त्वज्ञान के स्तर पर नागेश्वर यह स्पष्ट करता है कि मनुष्य के जीवन में सबसे बड़ा विष अहंकार और भय है। भय से ग्रस्त व्यक्ति सत्य का साथ नहीं दे पाता और अहंकार से ग्रस्त व्यक्ति भक्ति नहीं कर पाता। शिव यहाँ इन दोनों का उपचार करते हैं। नागेश्वर में पूजा का अर्थ है—अपने भीतर के सर्पों को पहचानना और उन्हें शिव को अर्पित कर देना。

Modern Relevance and Conclusion

आज के युग में, जहाँ भय कई रूपों में उपस्थित है—असुरक्षा, अनिश्चितता, प्रतिस्पर्धा—Nageshwar Jyotirlinga History का संदेश अत्यंत प्रासंगिक है। यह कहता है कि भय से मुक्त होने के लिए परिस्थितियों को बदलना आवश्यक नहीं; दृष्टि को बदलना आवश्यक है। शिव जब भीतर प्रकट होते हैं, तब कोई नाग डँस नहीं सकता। इस प्रकार द्वादश ज्योतिर्लिंगों की यात्रा में नागेश्वर वह चरण है जहाँ साधक समझता है कि शिव केवल शरण नहीं, साहस भी हैं। जहाँ विष शिव के गले का आभूषण बन जाता है, वहीं भय समाप्त हो जाता है। हर हर महादेव。