Mallikarjuna Jyotirlinga : शिव और शक्ति के मिलन का प्रतीक





Mallikarjuna Jyotirlinga History: शिव और शक्ति के मिलन का प्रतीक

Mallikarjuna Jyotirlinga History: शिव और शक्ति के मिलन से प्रकट हुआ संतुलन

सोमनाथ के बाद द्वादश ज्योतिर्लिंग परंपरा जिस स्थल पर आगे बढ़ती है, वह केवल भौगोलिक रूप से दक्षिण की ओर बढ़ना नहीं है, बल्कि शिव-तत्त्व की एक नई अनुभूति का उद्घाटन है। श्रीशैल पर्वत पर स्थित मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग शिव को उस रूप में प्रकट करता है, जहाँ वे कठोर वैराग्य के साथ-साथ करुणा, वात्सल्य और पारिवारिक उत्तरदायित्व को भी स्वीकार करते हैं।

शिवपुराण और स्कंदपुराण में वर्णित Mallikarjuna Jyotirlinga History (मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग का इतिहास) यह बताता है कि शिव केवल समाधिस्थ योगी नहीं, बल्कि वे जीवन के सभी आयामों को समेटने वाले परम तत्त्व हैं। भारतीय तीर्थों और संस्कृति की अधिक जानकारी के लिए आप Azaad Bharat की वेबसाइट पर जा सकते हैं。

Mythological Origins of Mallikarjuna Jyotirlinga History

पुराणों के अनुसार, कुमार कार्तिकेय—जो देवसेनापति और शिव-पार्वती के ज्येष्ठ पुत्र हैं—एक प्रसंग में स्वयं को उपेक्षित अनुभव करते हैं। नारद मुनि के संकेतों से उत्पन्न यह भाव केवल व्यक्तिगत नहीं था; यह अहं और अपेक्षा के टकराव का परिणाम था। कार्तिकेय क्रुद्ध होकर कैलास छोड़ देते हैं और दक्षिण की ओर क्रौंच पर्वत पर जा बैठते हैं।

पुत्र-वियोग में माता पार्वती का हृदय व्याकुल हो उठता है। वे शिव से कहती हैं कि योग और वैराग्य का मार्ग महान है, पर पुत्र का स्नेह भी जीवन का सत्य है। यह संवाद शिवपुराण में अत्यंत मार्मिक रूप में आता है, जहाँ शक्ति का करुण स्वर शिव के वैराग्य को भी द्रवित कर देता है。

Union of Firmness and Compassion

शिव तब यह स्वीकार करते हैं कि वैराग्य का अर्थ संवेदनहीनता नहीं है। वे पार्वती के साथ श्रीशैल पर्वत की ओर प्रस्थान करते हैं और वहीं निवास करने का संकल्प लेते हैं। यही वह क्षण है जहाँ शिव और शक्ति एक साथ स्थिर होते हैं। शिव यहाँ अर्जुन—अर्थात दृढ़, स्थिर और लक्ष्यनिष्ठ—स्वरूप में प्रकट होते हैं, और पार्वती मल्लिका—कोमल, सुगंधित और करुण—स्वरूप में। इसी से यह स्थल मल्लिकार्जुन कहलाता है। यह नाम स्वयं में एक दर्शन है: दृढ़ता और कोमलता का संयोग。

Significance of Srisailam in Mallikarjuna Jyotirlinga History

स्कंदपुराण में श्रीशैल का वर्णन केवल पर्वत के रूप में नहीं, बल्कि तप और अनुग्रह की भूमि के रूप में किया गया है। कृष्णा नदी के तट और घने वनों के बीच स्थित यह क्षेत्र साधना के लिए आदिकाल से उपयुक्त माना गया। ऋषियों का विश्वास था कि यहाँ की निःशब्दता में मन शीघ्र स्थिर होता है। शिव का यहाँ स्थिर होना इस बात का संकेत है कि ध्यान केवल एकांत में नहीं, संबंधों के मध्य भी संभव है。

Joint Worship of Shiva and Shakti

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग की विशेषता यह है कि यहाँ शिव और शक्ति की संयुक्त आराधना होती है। पार्वती यहाँ भ्रमरांबा के रूप में पूजित हैं—भ्रमर अर्थात भौंरा, जो पुष्प से पुष्प पर जाता है, पर अंततः सुगंध को ही ग्रहण करता है। यह प्रतीक बताता है कि जीवात्मा भटकती अवश्य है, पर अंत में परम सत्य की सुगंध तक पहुँचती है। शिव और शक्ति का यह सह-निवास बताता है कि सृष्टि का संतुलन ऊर्जा और चेतना—दोनों से बनता है。

Philosophical and Vedic Perspective

वेदों की दृष्टि से देखें तो शिव यहाँ रुद्र की कठोरता से आगे बढ़कर शिव—कल्याणकारी—स्वरूप में आते हैं। वैराग्य का अर्थ संसार से पलायन नहीं, बल्कि संसार में रहते हुए आसक्ति से परे होना है। मल्लिकार्जुन इस सिद्धांत को जीवंत करता है। यहाँ शिव न तो केवल संहारक हैं, न केवल योगी; वे पिता हैं, पति हैं और लोककल्याण के साक्षी भी。

इतिहास में श्रीशैल क्षेत्र को अनेक राजवंशों का संरक्षण मिला। चालुक्य, काकतीय और विजयनगर शासकों ने यहाँ मंदिर-परिसर का विस्तार किया। परंतु पुराणों की दृष्टि से इसका महत्व किसी राजाश्रय से नहीं, बल्कि शिव-शक्ति की स्थिर उपस्थिति से है। यह ज्योतिर्लिंग बताता है कि तीर्थ का बल शिल्प में नहीं, भाव और साधना में होता है。

Modern Relevance and Conclusion

आज के युग में, जहाँ पारिवारिक संबंध और आत्मिक साधना को परस्पर विरोधी समझ लिया गया है, Mallikarjuna Jyotirlinga History विशेष रूप से प्रासंगिक है। यह बताती है कि ईश्वर न तो केवल ध्यान में हैं, न केवल कर्म में—वे संतुलन में हैं। जो व्यक्ति अपने कर्तव्यों के बीच भी अंतर्मन को स्थिर रखता है, वही शिव-तत्त्व के निकट है。

मल्लिकार्जुन इसलिए द्वादश ज्योतिर्लिंगों में विशेष स्थान रखता है, क्योंकि यहाँ शिव ने यह स्पष्ट किया कि परम सत्य एकांगी नहीं होता। वह कोमल भी है, दृढ़ भी; मौन भी है, संवाद भी; वैराग्य भी है और प्रेम भी। यही समग्रता शिव को देवता नहीं, तत्त्व बनाती है। श्रीशैल का मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग हमें स्मरण कराता है कि जीवन की पूर्णता किसी एक मार्ग को चुनने में नहीं, बल्कि विपरीत दिखने वाले सत्यों के सामंजस्य में है। हर हर महादेव。