द्वादश ज्योतिर्लिंग

Date:30/01/2926
द्वादश ज्योतिर्लिंग

शिव-पुराण एवं स्कंद-पुराण में वर्णित शिव के बारह दिव्य प्रकाश स्तंभ

सनातन हिंदू दर्शन में भगवान शिव किसी एक रूप, आकार या सीमित पहचान में बंधे हुए नहीं हैं। वे सृष्टि से पहले भी थे, सृष्टि के साथ भी हैं और सृष्टि के लय के बाद भी रहेंगे। शिव को देव कहना उन्हें सीमित करना है, क्योंकि शिव तो वह तत्त्व हैं जिससे देवता भी उत्पन्न होते हैं। शिवपुराण में स्पष्ट कहा गया है कि शिव न साकार हैं, न निराकार—वे ज्योति, अर्थात चेतना का शुद्ध प्रकाश हैं।

इसी कारण शिव की उपासना किसी मूर्ति तक सीमित नहीं है। शिव का लिंग किसी शरीर का प्रतीक नहीं, बल्कि उस अदृश्य, अव्यक्त सत्य की पहचान है जिसे आँखों से नहीं देखा जा सकता, केवल अनुभव किया जा सकता है।

शिवपुराण का यह श्लोक इसी सत्य को उद्घाटित करता है—

न रूपं न च गन्धं न शब्दो न स्पर्शनं
ज्योतिर्मयं तु यल्लिंगं तदेव परमं शिवः

अर्थात शिव न रूप हैं, न गंध, न शब्द, न स्पर्श—
वे केवल ज्योति हैं, और वही ज्योति जब स्थिर होती है, वही ज्योतिर्लिंग कहलाती है।

ज्योति स्तंभ की उत्पत्ति: ब्रह्मा-विष्णु विवाद की पूर्ण कथा

सृष्टि के आरंभिक काल में, जब अहंकार ने पहली बार देवताओं को स्पर्श किया, तब ब्रह्मा और विष्णु में यह विवाद उत्पन्न हुआ कि सृष्टि का आधार कौन है। ब्रह्मा स्वयं को सृष्टिकर्ता मानते थे और विष्णु स्वयं को पालनकर्ता। इसी विवाद ने सृष्टि में असंतुलन पैदा कर दिया।

तभी आकाश से पृथ्वी तक एक अनंत अग्नि-स्तंभ प्रकट हुआ। उसका न कोई आदि था, न अंत। विष्णु वराह रूप धारण कर नीचे की ओर गए, ब्रह्मा हंस रूप में ऊपर की ओर—हजारों दिव्य वर्षों तक खोज हुई, पर ज्योति का अंत किसी को नहीं मिला। ब्रह्मा ने अहंकारवश असत्य का सहारा लिया, जबकि विष्णु सत्य पर अडिग रहे।

तभी उस ज्योति स्तंभ से स्वयं शिव प्रकट हुए और कहा—
“जो इस अनंत को मापना चाहता है, वह मुझे नहीं समझ सकता। जो विनम्र होकर इसे स्वीकार कर ले, वही मुझे जान सकता है।”

इसी ज्योति का अंश आगे चलकर पृथ्वी पर बारह स्थलों पर स्थिर हुआ। ये बारह स्थलों केवल तीर्थ नहीं बने, बल्कि मानव चेतना के बारह गहन पड़ाव बन गए—इन्हें ही द्वादश ज्योतिर्लिंग कहा गया।

सोमनाथ ज्योतिर्लिंग (गुजरात): अहंकार से क्षय और भक्ति से संतुलन

सोमनाथ की कथा मन और समय के संतुलन की कथा है। दक्ष प्रजापति की 27 कन्याएँ—जो 27 नक्षत्रों का प्रतीक हैं—चंद्रमा से विवाहित थीं। परंतु चंद्रमा का मन केवल रोहिणी में आसक्त रहा। यह पक्षपात केवल पारिवारिक अन्याय नहीं था, बल्कि सृष्टि के मानसिक संतुलन का विघटन था।

दक्ष ने क्रोधित होकर चंद्रमा को क्षय का श्राप दिया। चंद्रमा के क्षीण होने से वनस्पति, औषधियाँ और जीवन चक्र प्रभावित होने लगे। देवताओं ने जब यह देखा, तब उन्होंने चंद्रमा को शिव की शरण में भेजा।

प्रभास क्षेत्र में चंद्रमा ने वर्षों तक कठोर तप किया। शिव प्रकट हुए, पर उन्होंने श्राप पूर्णतः समाप्त नहीं किया। उन्होंने संतुलन का मार्ग दिया—कभी क्षय, कभी वृद्धि। यहीं शिव सोमनाथ, अर्थात सोम के नाथ बने।

सोमनाथ यह सिखाता है कि शिव नियमों को तोड़ते नहीं, पर दया के साथ संतुलन स्थापित करते हैं।

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग (श्रीशैलम): वैराग्य और वात्सल्य का संगम

मल्लिकार्जुन की कथा शिव के उस पक्ष को प्रकट करती है जिसे लोग अक्सर भूल जाते हैं। कार्तिकेय के वियोग में माता पार्वती शोकाकुल थीं। शिव, जो स्वयं वैराग्य के प्रतीक हैं, पत्नी के दुःख को देखकर तप छोड़कर श्रीशैल पर्वत पर आए और वहीं स्थिर हो गए।

यहाँ शिव अर्जुन (दृढ़ चेतना) और पार्वती मल्लिका (कोमल करुणा) के रूप में पूजित हुए। यह ज्योतिर्लिंग बताता है कि शिव केवल योगी नहीं, बल्कि संवेदनशील पिता और करुण पति भी हैं।

महाकालेश्वर (उज्जैन): समय पर विजय

उज्जैन में शिव महाकाल के रूप में प्रकट होते हैं—जो स्वयं समय के भी अधिपति हैं। यहाँ की कथा बताती है कि जब राक्षसी शक्तियों ने नगर को घेर लिया, तब एक बालक की निष्कलंक भक्ति ने शिव को बुला लिया।

महाकालेश्वर का दक्षिणमुखी स्वरूप और भस्म आरती यह स्मरण कराती है कि शरीर, सत्ता और वैभव सब नश्वर हैं। केवल चेतना शाश्वत है।

ओंकारेश्वर (नर्मदा तट): ब्रह्मांडीय नाद का स्थिर रूप

ओंकारेश्वर वह स्थान है जहाँ शिव शब्द से परे मौन में प्रकट होते हैं। नर्मदा के मध्य स्थित यह द्वीप ॐ के आकार का है। ॐ—सृष्टि, स्थिति और लय का संयुक्त स्वर है। शिव यहाँ इन तीनों से परे, साक्षी रूप में प्रतिष्ठित हैं।

केदारनाथ (हिमालय): तप और प्रायश्चित की पराकाष्ठा

पांडवों के अपराधबोध से उत्पन्न यह कथा बताती है कि शिव को बल से नहीं पाया जा सकता। शिव बैल रूप में विलीन हो गए। केदारनाथ में केवल उनका धड़ प्रकट हुआ। यह ज्योतिर्लिंग सिखाता है कि ईश्वर पीछा करने से नहीं, समर्पण से मिलते हैं।

भीमाशंकर (सह्याद्रि): धर्म की रक्षा हेतु संहार

राक्षस भीम द्वारा शिवभक्तों पर किए गए अत्याचारों के अंत हेतु शिव यहाँ प्रकट हुए। यह ज्योतिर्लिंग यह सिद्ध करता है कि करुणा का अर्थ दुर्बलता नहीं है—धर्म की रक्षा के लिए संहार भी आवश्यक है।

काशी विश्वनाथ: मोक्ष का द्वार

काशी शिव की नगरी है। शिवपुराण कहता है कि यहाँ मृत्यु भी भय नहीं, मुक्ति है। शिव स्वयं आत्मा को तारक मंत्र देकर भवसागर से पार कराते हैं। काशी बताती है कि मोक्ष जीवन से भागने में नहीं, जीवन को समझने में है।

त्र्यंबकेश्वर: चेतना के तीन नेत्र

त्र्यंबकेश्वर में शिव के तीन नेत्र सूर्य, चंद्र और अग्नि के प्रतीक हैं—कर्म, मन और ज्ञान। जब ये तीनों संतुलित होते हैं, तब शिवत्व प्रकट होता है।

वैद्यनाथ: करुणा का चिकित्सक रूप

रावण की तपस्या और शिव की करुणा इस ज्योतिर्लिंग में एक साथ दिखाई देती है। शिव यहाँ रोगहर्ता हैं—जो शारीरिक ही नहीं, अहंकारजन्य रोग भी हरते हैं।

नागेश्वर: भय और विष से मुक्ति

नागेश्वर ज्योतिर्लिंग यह सिखाता है कि भय बाहरी नहीं, आंतरिक होता है। शिव नागेश्वर बनकर बताते हैं कि जो शिव में स्थित है, वह विष से भी निर्भय हो जाता है।

रामेश्वरम: शिव-विष्णु समन्वय

राम द्वारा स्थापित यह ज्योतिर्लिंग सनातन धर्म के समन्वय का प्रतीक है। यहाँ मर्यादा और वैराग्य एक-दूसरे को नमन करते हैं।

घृष्णेश्वर: निष्काम भक्ति की विजय

घृष्णा की कथा यह सिद्ध करती है कि शिव को शास्त्र नहीं, अटूट श्रद्धा बाँधती है। यहाँ शिव सबसे मानवीय रूप में प्रकट होते हैं।

समापन

द्वादश ज्योतिर्लिंग बारह मंदिर नहीं हैं।
वे मानव चेतना की बारह अवस्थाएँ हैं—अहंकार से मुक्ति तक की यात्रा।

शिव को जानने के लिए कहीं जाना आवश्यक नहीं,
पर शिव को समझने के लिए इन कथाओं को अपने भीतर जीना अनिवार्य है।

हर हर महादेव।

🔺Follow on

🔺 Facebook
https://www.facebook.com/share/19dXuEqkJL/

🔺Instagram:
http://instagram.com/AzaadBharatOrg

🔺 Twitter:
twitter.com/AzaadBharatOrg

🔺 Telegram:
https://t.me/azaaddbharat

🔺Pinterest: https://www.pinterest.com/azaadbharat/