मौनी अमावस्या: मौन साधना, आत्मचिंतन और पितृ तर्पण का दिव्य पर्व

13January 2026

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🚩मौनी अमावस्या: मौन साधना का दिव्य रहस्य

मौनी अमावस्या माघ मास की अमावस्या तिथि को मनाई जाती है। यह दिन मौन, संयम, आत्मचिंतन, तप और पितृ तर्पण के लिए अत्यंत पुण्यकारी माना गया है। वेद, उपनिषद् और पुराणों में मौन को ब्रह्मज्ञान की साधना का श्रेष्ठ साधन बताया गया है।
✴️ऋग्वेद में कहा गया है—
“ऋतं वदिष्यामि सत्यं वदिष्यामि” अर्थात् वाणी को संयमित कर सत्य और ऋत का पालन करना ही आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग है।
✴️उपनिषदों में मौन को ब्रह्मस्वरूप कहा गया है—“मौनं ब्रह्मेति श्रुतेः” अर्थात् मौन स्वयं ब्रह्म का स्वरूप है।

🚩पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि
पद्म पुराण , स्कंद पुराण और ब्रह्म पुराण में माघ अमावस्या का विशेष महात्म्य वर्णित है।
🔅पद्म पुराण के अनुसार:
माघ मास की अमावस्या को स्नान, दान, जप, तप और मौन व्रत करने से जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट होते हैं।
🔅स्कंद पुराण में कहा गया है कि: इस तिथि को ब्रह्मा जी ने सृष्टि के नियमों का विस्तार किया और ऋषियों ने मौन साधना द्वारा दिव्य ज्ञान प्राप्त किया।
🔅मनु स्मृति के अनुसार,
महर्षि मनु ने इसी तिथि को कठोर मौन तपस्या से धर्म, समाज और मानव जीवन के नियमों का ज्ञान प्राप्त किया, इसलिए इस दिन को “मौनी अमावस्या” कहा गया।
🔅महाभारत में वर्णन आता है कि धर्मराज युधिष्ठिर ने इस दिन मौन व्रत रखकर पितरों की शांति हेतु तर्पण किया था।

🚩पितृ तर्पण का शास्त्रीय महत्व
गरुड़ पुराण में कहा गया है— “अमावास्यां पितॄणां तृप्तिर्भवति निश्चितम्” अर्थात् अमावस्या को तर्पण करने से पितर तृप्त होते हैं और कुल पर आशीर्वाद देते हैं।

🚩मौनी अमावस्या को किया गया तर्पण:
🔅पितृ दोष शांत करता है
🔅वंश वृद्धि का मार्ग खोलता है
🔅रोग, दरिद्रता और बाधाओं का नाश करता है

🚩शास्त्रोक्त व्रत विधि
💠स्नान
ब्रह्म मुहूर्त में गंगा, यमुना या किसी पवित्र नदी में स्नान। यदि संभव न हो तो गंगाजल मिलाकर स्नान करें।

💠संकल्प
“अहं मौनी अमावस्यायां मौनव्रतं करिष्ये, पितृतर्पणं च करिष्ये।”

💠मौन व्रत
दिनभर वाणी संयम रखें।आवश्यक संवाद संकेत या लेखन से करें।

💠तर्पण
काले तिल, जल, जौ और कुशा से पितरों का तर्पण करें।

💠जप
महामृत्युंजय मंत्र या “ॐ नमः शिवाय” का 108 बार जप करें।

💠दान
तिल, कंबल, अन्न, वस्त्र और गौ-सेवा करें।

🚩उपनिषदों में मौन साधना
🔅मुण्डकोपनिषद् में कहा गया है: “नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यः” अर्थात् आत्मज्ञान केवल वाणी से नहीं, बल्कि तप, मौन और साधना से प्राप्त होता है।
🔅कठोपनिषद् में वर्णन है कि
इंद्रियों का संयम और मौन, आत्मसाक्षात्कार का द्वार है।

🚩आयुर्वेदिक दृष्टि से लाभ
चरक संहिता के अनुसार:
🔅मौन व्रत वात दोष को शांत करता है
🔅उपवास से अग्नि शुद्ध होती है
🔅मानसिक तनाव, अनिद्रा और चिंता में कमी आती है
✴️मौन से:
🟠नाड़ी तंत्र संतुलित होता है
🟠प्राणशक्ति बढ़ती है
🟠मन स्थिर होता है

🚩योग और ध्यान की शास्त्रीय साधना
पतंजलि योगसूत्र के अनुसार: “योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः”
मौन चित्त की वृत्तियों को शांत करता है।
✴️मौनी अमावस्या पर:
🔅पद्मासन में ध्यान
🔅मूलाधार चक्र पर एकाग्रता
🔅ओंकार का जप
अत्यंत फलदायी माना गया है।

🚩कुंभ एवं संगम स्नान का महत्व
स्कंद पुराण में कहा गया है कि
प्रयागराज संगम में माघ अमावस्या का स्नान अश्वमेध यज्ञ के समान फल देता है।
🟠संगम स्नान से:
🔅पाप नाश
🔅पितृ तृप्ति
🔅आत्मशुद्धि
होती है।

🚩संतवाणी
🔅कबीरदास जी कहते हैं: “मौन साधु की ज्योति जगाय,
बिन बोले प्रभु पाय।”
🔅तुलसीदास जी लिखते हैं:
“मौन विधि विषम सम भए जेहि।”
🔅स्वामी विवेकानंद:
“मौन में ही आत्मा ईश्वर से संवाद करती है।”

🚩आधुनिक जीवन में मौनी अमावस्या
आज के युग में मौनी अमावस्या:
🔅डिजिटल डिटॉक्स
🔅मानसिक शांति
🔅पारिवारिक जुड़ाव
🔅पर्यावरण चेतना
का अवसर देती है।
यह पर्व हमें सिखाता है कि
कम बोलो, गहरा सोचो, शुद्ध जियो।

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