15 साल की वीरांगनाएँ जिन्होंने ब्रिटिश मजिस्ट्रेट को गोली मारी

03 January 2026

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🚩 15 साल की वह स्कूली छात्रा जिसने चॉकलेट खिलाकर ब्रिटिश मजिस्ट्रेट को गोली मार दी!

क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि 8वीं कक्षा की दो लड़कियां ब्रिटिश साम्राज्य के एक क्रूर अधिकारी के खिलाफ बंदूक उठा सकती हैं? सन 1931 में, दो बालिकाओं—शांति घोष (15 वर्ष) और सुनीति चौधरी (14 वर्ष)—ने इतिहास रच दिया। यह कहानी न केवल साहस की मिसाल है, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम के उस अध्याय की झलक देती है जब भारत की बेटियों ने भी हथियार उठा लिए थे।

🚩कोमिला की सर्द सुबह, 14 दिसंबर 1931
यह घटना उस दौर की है जब पूरा देश अंग्रेज़ों की गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था। कोमिला (अब बांग्लादेश) में जिला मजिस्ट्रेट चार्ल्स स्टीवंस अपने बंगले पर बैठे थे। तभी दो स्कूली छात्राएं उनसे मिलने पहुँचीं। उनका बहाना था—अपने स्कूल में ‘स्विमिंग क्लब’ शुरू करने की अनुमति लेना। कहा जाता है कि दोनों ने स्टीवंस को मुस्कुराते हुए चॉकलेट भेंट की। जब वह याचिका पढ़ने लगे, तभी इन मासूम दिखने वाली लड़कियों ने अपनी शॉल के नीचे छिपी पिस्तौलें निकालीं और सीधे फायर किया। गोली लगते ही स्टीवंस की मौत हो गई। यह ब्रिटिश राज के लिए एक बड़ा झटका था—क्योंकि जिसने हमला किया, वे कोई गुमनाम विद्रोही नहीं, बल्कि दो किशोर बालिकाएं थीं।

🚩गिरफ्तारी और अडिग हिम्मत
शांति घोष और सुनीति चौधरी को तुरंत गिरफ्तार कर लिया गया। लेकिन उन्होंने कोई डर या पछतावा नहीं दिखाया। अदालत में जब उन्हें सज़ा सुनाई जा रही थी, दोनों के चेहरे पर वही सहज मुस्कान थी।
✴️शांति घोष ने अदालत में कहा था— “It is better to die than live in a horse’s stable.” (घोड़ों के अस्तबल [गुलाम भारत] में रहने से तो मरना बेहतर है।) चूँकि वे नाबालिग थीं, इसलिए फांसी नहीं दी जा सकी। उन्हें आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई। सात वर्षों तक उन्होंने कठोर यातनाएँ सहीं, लेकिन किसी भी क्षण अंग्रेज़ों के आगे सिर नहीं झुकाया।
✴️1939 में गांधीजी और ब्रिटिश सरकार के बीच आम माफी (Amnesty) समझौते के बाद दोनों को रिहा कर दिया गया।

🚩आज़ाद भारत में नई शुरुआत
जेल से बाहर आने के बाद शांति घोष ने अपनी पढ़ाई पूरी की और स्वतंत्र भारत में भी सक्रिय रहीं। 1942 में उन्होंने चित्तरंजन दास (चटगांव के एक क्रांतिकारी) से विवाह किया। आगे चलकर वे पश्चिम बंगाल विधानसभा और विधान परिषद (MLA/MLC) की सदस्य बनीं और जनता की सेवा में जीवन समर्पित कर दिया। उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘अरुण वह्नि’ (Arun Bahni) भी लिखी — जिसका अर्थ है ‘भोर की अग्नि’ , यानी वह ज्वाला जिसने आज़ादी की सुबह का आह्वान किया। शांति घोष का निधन 1989 में हुआ।

🚩याद रखें इन वीरांगनाओं को
शांति घोष और सुनीति चौधरी— ये नाम भारतीय इतिहास के स्वर्णाक्षरों में दर्ज होने चाहिए। इन दोनों ने यह सिद्ध किया कि देशभक्ति और साहस उम्र नहीं देखता। हमारे स्वतंत्रता संग्राम की यह बाल अवस्था की बगावत इस बात का प्रमाण है कि भारत की बेटियाँ हर दौर में वीरता की मिसाल रही हैं।
🇮🇳 सलाम उन बेटियों को जिन्होंने बचपन की मासूमियत को देश की आज़ादी के नाम कर दिया।

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