#
## जब शिव ने भक्तों की रक्षा के लिए संहार को धर्म बनाया
भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग
द्वादश ज्योतिर्लिंगों की श्रृंखला में भीमाशंकर वह स्थल है जहाँ शिव की करुणा **रक्षा** के रूप में और उनकी उग्रता **धर्म-स्थापन** के रूप में प्रकट होती है। सह्याद्रि पर्वतमाला के घने वनों, गहरी घाटियों और निरंतर बदलते मौसम के बीच स्थित यह तीर्थ शिवपुराण और स्कंदपुराण में उस भूमि के रूप में वर्णित है जहाँ अधर्म की जड़ें गहरी हो चुकी थीं और जहाँ केवल उपदेश नहीं, **संहार** ही धर्म की पुनर्स्थापना कर सकता था।
पुराणों के अनुसार, त्रिपुरासुर वंश से उत्पन्न राक्षस **भीम** ने कठोर तपस्या द्वारा असाधारण शक्तियाँ प्राप्त कर ली थीं। शक्ति के साथ उसका अहंकार भी बढ़ता गया। उसने देवताओं और ऋषियों को भयभीत करना आरंभ किया, यज्ञों को नष्ट किया और विशेष रूप से **शिवभक्तों को लक्ष्य** बनाया। भीम का अत्याचार केवल शारीरिक नहीं था; वह भक्ति और साधना की स्वतंत्रता पर प्रहार था। सह्याद्रि के आश्रम उजड़ने लगे, मंत्र-जप रुकने लगे और भय ने साधकों के मन में घर कर लिया।
जब अत्याचार असहनीय हो गया, तब ऋषि-मुनि और देवता शिव की शरण में पहुँचे। शिवपुराण इस प्रसंग में एक गहन सत्य कहता है—**जब करुणा को बार-बार ठुकराया जाए, तब करुणा ही उग्रता का रूप लेती है**। शिव ने यह स्पष्ट किया कि अधर्म का अंत केवल वचन से नहीं, कर्म से होगा। उन्होंने भीम का सामना करने का संकल्प लिया और सह्याद्रि की उसी भूमि पर प्रकट हुए जहाँ भय ने सबसे अधिक घर किया था।
शिव और भीम के बीच हुआ युद्ध केवल अस्त्र-शस्त्र का संघर्ष नहीं था; यह **अहंकार और शरणागत भाव** के बीच का निर्णायक संग्राम था। पुराणों में वर्णन आता है कि युद्ध के समय पृथ्वी काँप उठी, आकाश में गर्जना गूँज उठी और सह्याद्रि की घाटियाँ प्रतिध्वनित हो उठीं। अंततः शिव ने भीम का संहार किया। पर यह संहार प्रतिशोध नहीं था—यह **भक्तों की रक्षा** और धर्म की पुनर्स्थापना के लिए किया गया आवश्यक कर्म था।
भीम के वध के पश्चात शिव ने उसी स्थान पर **ज्योति के रूप में स्थिर** होकर यह संकेत दिया कि जहाँ भी भक्ति पर अत्याचार होगा, वहाँ वे रक्षक बनकर उपस्थित रहेंगे। इसी कारण यह ज्योतिर्लिंग **भीमाशंकर** कहलाया—अर्थात वह स्थान जहाँ भीम का अहंकार शिव की ज्योति में विलीन हो गया।
स्कंदपुराण सह्याद्रि क्षेत्र को अत्यंत पवित्र बताता है। यहाँ के वन केवल प्राकृतिक सौंदर्य नहीं, बल्कि **तप और साधना के साक्षी** हैं। कहा जाता है कि यहाँ की निस्तब्धता में मंत्र स्वयं प्रतिध्वनित होते हैं। भीमाशंकर का वातावरण साधक को यह अनुभव कराता है कि शिव केवल मंदिरों में नहीं, **प्रकृति के संरक्षण** में भी निवास करते हैं। यही कारण है कि यह क्षेत्र आज भी वन्य जीवन और जलस्रोतों से समृद्ध है—मानो शिव की रक्षा आज भी सक्रिय हो।
वेदों में रुद्र को भय-नाशक कहा गया है—*नमस्ते रुद्र मन्यव*। भीमाशंकर इसी वैदिक भाव का मूर्त रूप है। यहाँ शिव भय उत्पन्न नहीं करते, बल्कि भय को समाप्त करते हैं। जो भक्त अत्याचार, अन्याय या मानसिक संकट से ग्रस्त होता है, उसके लिए भीमाशंकर आश्रय का प्रतीक बन जाता है। यह ज्योतिर्लिंग सिखाता है कि धर्म का अर्थ केवल सहनशीलता नहीं, **आवश्यक होने पर दृढ़ प्रतिकार** भी है।
इतिहास में भीमाशंकर क्षेत्र अपेक्षाकृत एकांत रहा। बड़े राजवंशों के वैभव से दूर, यह तीर्थ लोकभक्ति के बल पर जीवित रहा। यही इसकी विशेषता है। यहाँ शिव किसी राजसत्ता के संरक्षक नहीं, बल्कि **साधारण भक्त के रक्षक** हैं। यह स्थान बताता है कि ईश्वर की प्राथमिकता सत्ता नहीं, सत्य है।
आध्यात्मिक तत्त्वज्ञान के स्तर पर भीमाशंकर मनुष्य को यह बोध कराता है कि करुणा और दृढ़ता विरोधी नहीं हैं। जब करुणा निर्बल समझी जाने लगे, तब वही करुणा उग्र होकर धर्म की रक्षा करती है। शिव यहाँ यह सिखाते हैं कि भय से भागना समाधान नहीं; **सत्य के साथ खड़े होना** ही वास्तविक साधना है।
आज के समय में, जब अन्याय कई रूपों में सामने आता है—सामाजिक, मानसिक, वैचारिक—भीमाशंकर की कथा अत्यंत प्रासंगिक हो जाती है। यह हमें स्मरण कराती है कि शांति तभी स्थायी होती है, जब अन्याय को चुनौती दी जाए। शिव का यह स्वरूप हमें साहस देता है, न कि भय।
इस प्रकार द्वादश ज्योतिर्लिंगों की यात्रा में भीमाशंकर वह पड़ाव है जहाँ साधक समझता है कि शिव केवल ध्यान में नहीं, **संघर्ष में भी उपस्थित** हैं। जहाँ भी भक्ति और सत्य पर आघात होता है, वहाँ शिव रक्षक बनकर खड़े होते हैं—और वही ज्योति भीमाशंकर कहलाती है।
**हर हर महादेव।**
—
