जगन्नाथ पुरी की अनोखी एकादशी जहाँ भक्ति नियमों से बड़ी होती है

14 January 2026

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🛕जगन्नाथ पुरी की अनोखी एकादशी
जहाँ भक्ति नियमों से बड़ी होती है

🚩जब भी हम एकादशी का नाम सुनते हैं, तो मन में तुरंत व्रत, फलाहार और चावल से परहेज़ की बात आती है। पूरे भारत में एकादशी को अनाज छोड़ने की परंपरा है। लेकिन ओडिशा की पावन भूमि पर बसे जगन्नाथ पुरी में यह परंपरा कुछ अलग है।
🔅यहाँ एकादशी को भी चावल का महाप्रसाद मिलता है। और यही बात लोगों को हैरान कर देती है।
🔅“जब हर जगह चावल वर्जित है, तो पुरी में क्यों नहीं?”
“क्या यहाँ एकादशी उलटी होती है?”
🔅असल में, यहाँ कोई नियम उलटा नहीं है – बस भगवान की लीला अलग है।

💠एकादशी क्यों खास है?
शास्त्रों में एकादशी को भगवान विष्णु का प्रिय दिन कहा गया है। इस दिन उपवास करने से मन शुद्ध होता है, इंद्रियाँ संयम में रहती हैं और भक्ति गहरी होती है। हम व्रत इसलिए रखते हैं क्योंकि हम भगवान के लिए कुछ त्याग करना चाहते हैं। लेकिन जगन्नाथ पुरी में त्याग से ज़्यादा भगवान की इच्छा को महत्व दिया जाता है।

💠पुरी की तिथि क्यों अलग लगती है?
जगन्नाथ मंदिर में पूजा किसी घड़ी या कैलेंडर से नहीं, महाप्रभु की लीला से चलती है।कभी-कभी ऐसा होता है कि
बाकी जगहों पर एकादशी होती है, और पुरी में अगले दिन मानी जाती है। इसी को लोग मज़ाक में कहते हैं – “यहाँ एकादशी उल्टी लटकी रहती है।”
पर सच यह है कि यहाँ सब कुछ भगवान की मर्जी से होता है।

💠अब असली सवाल:
एकादशी को चावल क्यों मिलता है?
इसका जवाब एक बहुत सुंदर और भावपूर्ण कथा में छुपा है।
✴️माँ लक्ष्मी की नाराज़गी
कहते हैं, एक बार माँ लक्ष्मी ने भगवान जगन्नाथ से पूछा:
“प्रभु, एकादशी के दिन आप भक्तों को अन्न क्यों नहीं खाने देते? अन्न तो मेरा ही स्वरूप है।”
भगवान मुस्कुराए और बोले:
“यह व्रत आत्मशुद्धि के लिए है।” माँ लक्ष्मी को यह बात अच्छी नहीं लगी। उन्होंने कहा:
“अगर मेरे स्वरूप का अपमान होगा, तो मैं यहाँ नहीं रहूँगी।” और माँ लक्ष्मी नीलांचल धाम छोड़कर चली गईं।
जब लक्ष्मी चली गईं… पुरी में सब कुछ बदल गया। अन्न की कमी होने लगी, लोगों को कष्ट होने लगे, समृद्धि घटने लगी।
तब भगवान जगन्नाथ को समझ आया कि लक्ष्मी के बिना लीला अधूरी है। उन्होंने माँ लक्ष्मी से क्षमा माँगी।
🔅 माँ लक्ष्मी की शर्त
माँ लक्ष्मी ने कहा: “अगर मुझे सम्मान चाहिए, तो नीलांचल धाम में
एकादशी को भी अन्न-भोग होगा।”
भगवान जगन्नाथ ने यह स्वीकार कर लिया और तभी से पुरी में एकादशी को भी चावल का महाप्रसाद मिलता है।

📌क्या यह गलत है?
नहीं ❌ क्योंकि यह कोई मनुष्यों का नियम नहीं, भगवान की इच्छा है और जगन्नाथ का महाप्रसाद
साधारण भोजन नहीं होता वह तो
कृपा का रूप है।

💠यहाँ नियम नहीं, रिश्ता चलता है
पुरी हमें सिखाती है कि भक्ति सिर्फ नियमों से नहीं चलती, वह प्रेम और विश्वास से चलती है। जहाँ भगवान खुद कहें “खाओ”, वहाँ उपवास का सवाल ही नहीं।

🚩निष्कर्ष
जगन्नाथ पुरी में एकादशी: अलग समय पर हो सकती है और चावल भी मिलता है , पर इसका मतलब यह नहीं कि धर्म बदला गया है। इसका मतलब यह है कि यहाँ भगवान खुद रास्ता दिखाते हैं।
“जहाँ जगन्नाथ हैं, वहाँ नियम नहीं, केवल कृपा चलती है।”

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