क्या सच में हिंदू संतों को निशाना बनाया जा रहा है?

24 February 2026

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🚩क्या सच में हिंदू संतों को निशाना बनाया जा रहा है?
इतिहास, सत्ता, मीडिया और जनमत की राजनीति का गहन विश्लेषण

🕉️जब किसी समाज को यह महसूस होने लगे कि उसके आध्यात्मिक प्रतीकों पर बार-बार प्रश्न उठाए जा रहे हैं, तो यह केवल धार्मिक मुद्दा नहीं रह जाता—यह पहचान, सम्मान और विश्वास का प्रश्न बन जाता है। भारत में संत और गुरु केवल धार्मिक उपदेशक नहीं रहे हैं वे सामाजिक दिशा देने वाले, सांस्कृतिक , आत्मविश्वास जगाने वाले और लाखों लोगों के नैतिक मार्गदर्शक रहे हैं। इसलिए जब भी किसी बड़े हिंदू संत पर आरोप लगता है, प्रतिक्रिया केवल कानूनी नहीं, भावनात्मक और सामूहिक भी होती है।

💠इतिहास हमें सिखाता है कि किसी भी सभ्यता को कमजोर करना हो तो उसके सांस्कृतिक और आध्यात्मिक केंद्रों को कमजोर किया जाता है। प्राचीन विश्वविद्यालयों, आश्रमों और मंदिरों पर हमले केवल भौतिक ढाँचों को नष्ट करने के लिए नहीं थे वे उस आत्मविश्वास को तोड़ने के प्रयास थे जो समाज को जोड़ता था। आध्यात्मिक नेतृत्व यदि जनता को एक साझा पहचान देता है, तो वह केवल धार्मिक शक्ति नहीं, सामाजिक शक्ति भी बन जाता है और जहाँ सामाजिक शक्ति होती है, वहाँ सत्ता की असहजता भी हो सकती है।

💠मध्यकाल और औपनिवेशिक काल दोनों में यह देखा गया कि जब आध्यात्मिक चेतना राष्ट्रचेतना से जुड़ी, तब उसे नियंत्रण में रखने का प्रयास हुआ। कारण सरल था—जनमत। यदि संत समाज को संगठित कर सकते हैं, तो वे जनमत को भी प्रभावित कर सकते हैं। आधुनिक लोकतंत्र में यह प्रभाव और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। आज किसी भी बड़े संत के पास लाखों अनुयायी, संसाधन और सामाजिक पहुँच होती है। ऐसे में यदि उन पर आरोप लगते हैं, तो मामला केवल व्यक्तिगत नहीं रहता—वह राष्ट्रीय विमर्श बन जाता है।

💠यहीं से मीडिया की भूमिका शुरू होती है और अक्सर विवाद भी। आधुनिक मीडिया केवल सूचना देने का माध्यम नहीं रहा वह धारणा निर्माण का उपकरण भी बन चुका है। जब किसी प्रभावशाली हिंदू संत पर आरोप लगता है, तो कई चैनलों पर तुरंत तीखी बहसें शुरू हो जाती हैं। आरोप सिद्ध होने से पहले ही शब्दावली बदल जाती है “आरोपी” से “ढोंगी”, “गुरु” से “गॉडमैन” और “संत” से “स्वयंभू बाबा” तक की भाषा इस्तेमाल होने लगती है। यह शब्द चयन तटस्थ नहीं होता यह दर्शकों के मन में एक विशेष छवि गढ़ता है।

💠मीडिया की आर्थिक संरचना भी इस विमर्श को प्रभावित करती है। TRP आधारित मॉडल में सनसनी, संघर्ष और भावनात्मक उग्रता अधिक बिकती है। यदि किसी बड़े हिंदू संत पर आरोप है, तो वह स्वाभाविक रूप से बड़ी खबर बनेगा क्योंकि उसका अनुयायी वर्ग विशाल है। अधिक दर्शक, अधिक बहस, अधिक विज्ञापन—यह एक व्यावसायिक चक्र है। लेकिन इसी प्रक्रिया में आरोप और दोष सिद्धि के बीच की संवैधानिक दूरी अक्सर धुंधली हो जाती है। अदालत वर्षों में फैसला देती है, परंतु मीडिया कुछ दिनों में सार्वजनिक धारणा तय कर देता है।

💠सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और तीखा कर दिया है। छोटे क्लिप, अधूरी जानकारी और भावनात्मक टिप्पणियाँ वायरल होती हैं। लोग पूरे फैसले या कानूनी दस्तावेज पढ़ने के बजाय सुर्खियों पर भरोसा कर लेते हैं। इससे समाज दो ध्रुवों में बँट जाता है—एक पक्ष बिना जाँच के संत को निर्दोष घोषित कर देता है, दूसरा पक्ष बिना निर्णय के दोषी। दोनों ही प्रतिक्रियाएँ न्यायिक प्रक्रिया को कमजोर करती हैं।

💠क्या मीडिया केवल हिंदू संतों के मामले में कठोर होता है? यह कहना पूर्ण सत्य नहीं होगा कि अन्य धर्मों के नेताओं पर कभी आलोचना या कार्रवाई नहीं होती। विभिन्न समुदायों के धार्मिक नेताओं पर भी आरोप लगे हैं और कई मामलों में गिरफ्तारी तथा सजा हुई है। किंतु कवरेज की शैली, भाषा और तीव्रता भिन्न हो सकती है। कभी “व्यक्ति विशेष” पर जोर दिया जाता है, कभी पूरे धार्मिक ढाँचे पर प्रश्न खड़े कर दिए जाते हैं। यही अंतर लोगों में चयनात्मकता की भावना पैदा करता है।

💠मीडिया का एक और आयाम वैचारिक झुकाव है। कुछ मंच स्वयं को “प्रगतिशील” कहकर धार्मिक संस्थाओं की आलोचना को अपना मिशन मानते हैं, जबकि कुछ अन्य मंच हर आरोप को षड्यंत्र बताकर खारिज कर देते हैं। दोनों अतियाँ सत्य की खोज से दूर ले जाती हैं। निष्पक्ष पत्रकारिता का अर्थ है तथ्यों को सामने रखना, अदालत की प्रक्रिया का सम्मान करना और भाषा में संयम रखना। जब यह संतुलन बिगड़ता है, तो न्याय से पहले नैरेटिव बन जाता है।

💠लेकिन इस पूरी बहस में एक कठिन सत्य भी स्वीकार करना आवश्यक है। धर्म या संत का पद किसी को कानून से ऊपर नहीं रखता। यदि कोई अपराध सिद्ध होता है, तो दंड होना चाहिए—चाहे वह किसी भी धर्म का व्यक्ति हो। क्योंकि धर्म के नाम पर अपराध करना स्वयं धर्म का सबसे बड़ा अपमान है। समाज की परिपक्वता इसी में है कि वह अपने प्रतीकों से भी जवाबदेही की अपेक्षा रखे।

💠आँखें खोलने वाली बात यह है कि आज संघर्ष केवल अदालतों में नहीं, बल्कि विचार और छवि के स्तर पर होता है। यदि समाज बिना जाँच के हर आरोप को षड्यंत्र कहेगा, तो वह आत्मसमीक्षा खो देगा। यदि वह बिना प्रमाण हर संत को दोषी मानेगा, तो वह अपनी सांस्कृतिक जड़ों से कट जाएगा। संतुलन ही शक्ति है।

💠यदि किसी को मीडिया में पक्षपात दिखाई देता है, तो उसका समाधान भावनात्मक उग्रता नहीं, बल्कि तथ्यात्मक अध्ययन, मीडिया साक्षरता और कानूनी कार्रवाई है। लोकतंत्र में स्थायी परिवर्तन नारे से नहीं, प्रमाण और प्रक्रिया से आते हैं। धर्म की रक्षा आक्रोश से नहीं, बल्कि सत्य, पारदर्शिता और न्याय के प्रति दृढ़ प्रतिबद्धता से होती है।

🚩अंततः प्रश्न यह नहीं कि कौन सा धर्म निशाने पर है, बल्कि यह कि क्या हम एक ऐसे समाज का निर्माण कर रहे हैं जहाँ न्याय निष्पक्ष हो, मीडिया जिम्मेदार हो और आस्था विवेक के साथ जुड़ी हो। यदि यह संतुलन बना रहा, तो न तो निर्दोष की प्रतिष्ठा अनावश्यक रूप से नष्ट होगी और न ही दोषी आस्था की आड़ में बच पाएगा। यही जागरूकता की वास्तविक शुरुआत है।

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