अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभा की भूमिका, ग्राम सभा की सीमा और शक्ति

27 February 2026

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🚩अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभा की भूमिका, ग्राम सभा की सीमा और शक्ति

🇮🇳भारत का लोकतंत्र केवल संसद, विधानसभाओं और अदालतों तक सीमित नहीं है। इसकी जड़ें गांवों में हैं — और विशेषकर अनुसूचित क्षेत्रों में, जहाँ ग्राम सभा केवल प्रशासनिक इकाई नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक जीवन का केंद्र है। हाल के वर्षों में छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले से जुड़े एक मामले और उस पर Supreme Court of India की टिप्पणी के बाद यह प्रश्न फिर से चर्चा में आया है कि अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभा की वास्तविक भूमिका क्या है, उसकी शक्ति कितनी है, और उसकी संवैधानिक सीमा कहाँ तक है। यह विस्तृत लेख आम नागरिकों के लिए तैयार किया गया है, ताकि वे इस विषय को भावनाओं या अफवाहों के आधार पर नहीं, बल्कि संवैधानिक और कानूनी दृष्टिकोण से समझ सकें।

🔹अनुसूचित क्षेत्र: विशेष व्यवस्था क्यों?
भारत एक विविधताओं वाला देश है। कुछ क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ आदिवासी समुदाय सदियों से अपनी पारंपरिक व्यवस्था के अनुसार जीवन जीते आए हैं। इन क्षेत्रों में भूमि, जंगल, जल और प्राकृतिक संसाधनों का सामुदायिक उपयोग होता रहा है। स्वतंत्रता के बाद यह महसूस किया गया कि यदि इन क्षेत्रों को सामान्य प्रशासनिक ढांचे में बिना विशेष सुरक्षा के शामिल किया गया, तो उनकी सांस्कृतिक पहचान और संसाधन खतरे में पड़ सकते हैं।इसीलिए संविधान में पाँचवीं अनुसूची (Fifth Schedule) के माध्यम से इन क्षेत्रों को विशेष संरक्षण दिया गया।
✴️पाँचवीं अनुसूची के तहत:
* राज्यपाल को विशेष शक्तियाँ दी गईं।
* आदिवासी सलाहकार परिषद (Tribes Advisory Council) की व्यवस्था की गई।
* ऐसे कानून बनाए जा सकते हैं जो इन क्षेत्रों की विशेष परिस्थितियों के अनुरूप हों।
यहीं से ग्राम सभा की सशक्त भूमिका का विचार मजबूत हुआ।

🔹पेसा (PESA) कानून का जन्म
1992 में 73वाँ संविधान संशोधन पारित हुआ, जिससे पंचायती राज व्यवस्था को संवैधानिक दर्जा मिला। इसका उद्देश्य था — सत्ता का विकेंद्रीकरण और गांव स्तर पर लोकतंत्र को मजबूत करना। लेकिन अनुसूचित क्षेत्रों के लिए यह संशोधन सीधे लागू नहीं किया गया। कारण यह था कि वहाँ पहले से पारंपरिक ग्राम शासन व्यवस्था मौजूद थी। इसीलिए 1996 में Panchayats (Extension to Scheduled Areas) Act, 1996 (PESA) बनाया गया।
🔸पेसा का मूल सिद्धांत था:
“अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभा को वास्तविक निर्णय शक्ति मिले।”
यह कानून केवल प्रशासनिक सुधार नहीं था, बल्कि आदिवासी स्वशासन की संवैधानिक मान्यता थी।

🔹ग्राम सभा क्या है? एक स्पष्ट समझ
ग्राम सभा किसी गांव के सभी वयस्क मतदाताओं का सामूहिक मंच है। यह पंचायत से अलग है। पंचायत चुने हुए प्रतिनिधियों की संस्था है, जबकि ग्राम सभा पूरे गांव की जनता का समूह है। अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभा को सर्वोच्च स्थानीय इकाई माना गया है। इसका अर्थ है कि स्थानीय जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णय सामूहिक रूप से लिए जा सकते हैं।

🔹ग्राम सभा की भूमिका: जमीनी लोकतंत्र का आधार
▫️ सांस्कृतिक संरक्षण
आदिवासी समाज में संस्कृति केवल परंपरा नहीं, बल्कि पहचान का आधार है। ग्राम सभा को अपनी सामाजिक प्रथाओं, रीति-रिवाजों और पारंपरिक कानूनों की रक्षा का अधिकार है।
▫️प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार
जल, जंगल और जमीन आदिवासी जीवन का केंद्र हैं। पेसा कानून ग्राम सभा को लघु वन उपज पर स्वामित्व और संसाधनों के प्रबंधन में भूमिका देता है।
▫️भूमि अधिग्रहण पर परामर्श
यदि किसी परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहित की जानी है, तो ग्राम सभा से परामर्श आवश्यक माना गया है।
▫️स्थानीय योजनाओं की स्वीकृति
विकास योजनाएँ ग्राम सभा की जानकारी और सहभागिता से बनाई जानी चाहिए।
▫️विवाद निपटान
कई मामलों में ग्राम सभा पारंपरिक तरीकों से विवाद सुलझाने में भूमिका निभाती है।
इन सभी भूमिकाओं से स्पष्ट है कि ग्राम सभा केवल औपचारिक संस्था नहीं, बल्कि सामाजिक-सामुदायिक शक्ति का केंद्र है।

🔹ग्राम सभा की शक्ति: वास्तविकता और भ्रम
कई बार यह धारणा बनाई जाती है कि पेसा कानून के तहत ग्राम सभा को “पूर्ण स्वतंत्रता” मिल गई है।
वास्तविकता यह है कि ग्राम सभा को महत्वपूर्ण शक्ति मिली है, लेकिन यह शक्ति संवैधानिक ढांचे के भीतर है।
ग्राम सभा:
✔ स्थानीय मामलों में निर्णय ले सकती है
✔ सांस्कृतिक संरक्षण के लिए नियम बना सकती है
✔ संसाधनों के उपयोग पर सामूहिक निर्णय ले सकती है
लेकिन:
✘ वह संविधान से ऊपर नहीं है
✘ वह मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं कर सकती
✘ वह राज्य या केंद्र के कानूनों के विरुद्ध निर्णय नहीं ले सकती

🔹ग्राम सभा की सीमा: संविधान सर्वोपरि
भारत में संविधान सर्वोच्च कानून है।।यदि ग्राम सभा का कोई निर्णय:
* अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन करे
* अनुच्छेद 19 (स्वतंत्रता के अधिकार) को प्रभावित करे
* अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) का अतिक्रमण करे
* सार्वजनिक व्यवस्था के विरुद्ध हो
तो उसे अदालत में चुनौती दी जा सकती है।
हाल ही में कांकेर से जुड़े मामले में भी यही प्रश्न उठा था। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि ग्राम सभा की भूमिका मान्य है, लेकिन संवैधानिक प्रक्रिया और सीमाएँ अनिवार्य हैं।

🔹धार्मिक स्वतंत्रता बनाम सांस्कृतिक अधिकार
भारत का संविधान अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता देता है। लेकिन यह स्वतंत्रता पूर्ण नहीं है। यह “सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य” के अधीन है।
दूसरी ओर, पेसा कानून आदिवासी समुदायों को अपनी संस्कृति और सामाजिक व्यवस्था की रक्षा का अधिकार देता है। जब इन दोनों अधिकारों के बीच टकराव होता है, तो अदालत को संतुलन बनाना पड़ता है। यही संतुलन भारतीय लोकतंत्र की जटिलता और परिपक्वता को दर्शाता है।

🔹 कांकेर मामले का संदर्भ
कांकेर जिले के कुछ गांवों में ग्राम सभा द्वारा लगाए गए बोर्डों और निर्णयों को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ। कुछ लोगों ने इसे धार्मिक स्वतंत्रता के विरुद्ध बताया, जबकि समर्थकों का कहना था कि यह सांस्कृतिक संरक्षण का प्रयास है। मामला जब अदालत पहुँचा, तो प्रक्रिया और वैधानिक उपायों का प्रश्न प्रमुख रहा। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि पहले स्थानीय उपाय अपनाए जाने चाहिए।
इससे यह संदेश गया कि:
* ग्राम सभा की भूमिका मान्य है
* लेकिन न्यायिक प्रक्रिया का पालन आवश्यक है

🔹 लोकतंत्र का बहु-स्तरीय ढांचा
भारत में शासन के कई स्तर हैं:
▫️केंद्र सरकार
▫️राज्य सरकार
▫️जिला प्रशासन
▫️पंचायत
▫️ग्राम सभा
अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभा इस ढांचे का महत्वपूर्ण स्तंभ है। यदि ग्राम सभा कमजोर होगी, तो स्थानीय लोकतंत्र भी कमजोर होगा।

🔹ग्राम सभा को मजबूत क्यों करना जरूरी है?
✴️स्थानीय भागीदारी बढ़ती है
✴️विकास योजनाएँ स्थानीय जरूरतों के अनुसार बनती हैं
✴️ संसाधनों का दुरुपयोग कम होता है
✴️सांस्कृतिक पहचान सुरक्षित रहती है
लेकिन साथ ही यह भी जरूरी है कि:
▫️निर्णय पारदर्शी हों
▫️सभी समुदायों की भागीदारी हो
▫️संवैधानिक मर्यादा का पालन हो

🔹 भविष्य की चुनौतियाँ
▫️पेसा के नियम कई राज्यों में पूरी तरह लागू नहीं है
▫️जागरूकता की कमी है
▫️ग्राम सभा और पंचायत के अधिकारों में भ्रम है
▫️कानूनी व्याख्याओं की आवश्यकता है
इन चुनौतियों का समाधान स्पष्ट नीति और जागरूकता से ही संभव है।

🚩 निष्कर्ष: शक्ति और सीमा का संतुलन
अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभा लोकतंत्र की जड़ है।
पेसा कानून ने उसे शक्ति दी है — लेकिन संविधान ने उसकी सीमा भी तय की है। ग्राम सभा की भूमिका महत्वपूर्ण है, उसकी शक्ति वास्तविक है, और उसकी सीमा संवैधानिक है। यही संतुलन भारतीय लोकतंत्र की मजबूती है —
जहाँ स्थानीय स्वशासन और राष्ट्रीय संविधान दोनों साथ-साथ चलते हैं।
अंततः, ग्राम सभा की सशक्त और जिम्मेदार भूमिका ही अनुसूचित क्षेत्रों के विकास, सांस्कृतिक संरक्षण और लोकतांत्रिक मजबूती की कुंजी है।

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