
# ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग
## जहाँ ‘ॐ’ के नाद में शिव सृष्टि, स्थिति और लय से परे प्रकट होते हैं
ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग
द्वादश ज्योतिर्लिंगों की परंपरा में ओंकारेश्वर वह स्थल है जहाँ शिव को किसी कथा-पात्र या किसी ऐतिहासिक प्रसंग से नहीं, बल्कि **ब्रह्मांडीय नाद** के रूप में जाना जाता है। नर्मदा नदी के मध्य स्थित मंधाता द्वीप—जो ऊपर से देखने पर स्वयं **ॐ** के आकार का प्रतीत होता है—शिवपुराण, स्कंदपुराण और लोक-शैव परंपराओं में उस स्थान के रूप में वर्णित है जहाँ ध्वनि, चेतना और मौन एक साथ मिलते हैं। यहाँ शिव किसी घटना के उत्तर में नहीं, बल्कि **सृष्टि के मूल सिद्धांत** के रूप में स्थिर हैं।
पुराणों में वर्णन आता है कि देवताओं और दानवों के बीच लंबे समय तक चले संघर्ष ने सृष्टि के संतुलन को डगमगा दिया था। युद्ध केवल बाहरी नहीं था; यह **अहंकार और अधिकार** का संघर्ष था। जब यह द्वंद्व चरम पर पहुँचा, तब देवताओं ने शिव की शरण ली। शिव ने किसी शस्त्र या संहार का मार्ग नहीं चुना। उन्होंने स्वयं को **ओंकार**—अर्थात ॐ—के रूप में प्रकट किया। ॐ वह नाद है जिससे सृष्टि का विस्तार होता है, जिसमें वह स्थित रहती है और जिसमें ही अंततः विलीन हो जाती है। इसी नाद के स्थिर होने से नर्मदा के मध्य यह द्वीप प्रकट हुआ और शिव यहाँ **ओंकारेश्वर** कहलाए।
वेदों में ॐ को प्रणव कहा गया है—सभी मंत्रों का मूल। ‘अ’ सृष्टि का प्रतीक है, ‘उ’ स्थिति का और ‘म’ लय का। पर शिव इन तीनों से परे हैं—वे इनका **साक्षी तत्त्व** हैं। ओंकारेश्वर में यही दर्शन मूर्त रूप लेता है। यहाँ शिव किसी एक अवस्था में नहीं बँधते; वे परिवर्तन के मध्य अचल रहते हैं। इसीलिए यह ज्योतिर्लिंग साधना की दृष्टि से अत्यंत सूक्ष्म माना गया है। यहाँ आने वाला साधक शब्दों से नहीं, **मौन से** शिव को अनुभव करता है।
स्कंदपुराण में मंधाता द्वीप का उल्लेख तपोभूमि के रूप में मिलता है। कहा गया है कि यहाँ अनेक ऋषियों ने दीर्घकाल तक साधना की, क्योंकि नर्मदा की धारा स्वयं में शुद्धि और स्थिरता का प्रतीक मानी गई है। नर्मदा को शिव की पुत्री कहा गया है—एक ऐसी धारा जो हिमालय की ऊँचाइयों से नहीं, बल्कि अंतःस्थल से प्रकट होती है। यह प्रतीक बताता है कि **शुद्धता बाहर से नहीं, भीतर से जन्म लेती है**। ओंकारेश्वर इसी आंतरिक शुद्धता का केंद्र है।
इस ज्योतिर्लिंग से जुड़ी एक अन्य परंपरा में मंधाता नामक राजा का उल्लेख मिलता है, जिन्होंने यहाँ शिव की आराधना कर लोक-कल्याण का वरदान पाया। यह कथा संकेत देती है कि सत्ता और साधना विरोधी नहीं हैं, यदि सत्ता अहंकार से मुक्त हो। ओंकारेश्वर में शिव राजाओं के भी देवता हैं और संन्यासियों के भी—क्योंकि यहाँ आराधना का आधार पद नहीं, **चेतना की शुद्धता** है।
इतिहास में ओंकारेश्वर क्षेत्र को परमार, होल्कर और अन्य राजवंशों का संरक्षण मिला। पर इस स्थान की महिमा किसी स्थापत्य या वैभव से नहीं, बल्कि **नाद और मौन के संतुलन** से बनी रही। मंदिर की सीढ़ियाँ, नर्मदा की परिक्रमा और द्वीप की परिधि—सब साधक को धीरे-धीरे बाहरी जगत से भीतर की ओर ले जाते हैं। यहाँ की यात्रा वास्तव में **अंतर्यात्रा** बन जाती है।
आध्यात्मिक दृष्टि से ओंकारेश्वर मनुष्य को यह बोध कराता है कि जीवन में परिवर्तन अनिवार्य है, पर चेतना का केंद्र अडिग रह सकता है। जब मनुष्य स्वयं को केवल ‘अ’ या ‘उ’ या ‘म’ में बाँध लेता है—केवल सृजन, केवल भोग या केवल त्याग में—तब असंतुलन उत्पन्न होता है। शिव यहाँ यह सिखाते हैं कि पूर्णता इन तीनों के पार जाकर **साक्षी भाव** में स्थित होने से आती है।
आज के युग में, जहाँ शोर, गति और सूचना का अतिरेक है, ओंकारेश्वर का संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है। यह स्थान स्मरण कराता है कि सभी ध्वनियों के मूल में एक नाद है, और सभी गतियों के केंद्र में एक मौन। जो व्यक्ति उस मौन को छू लेता है, उसके लिए जीवन का कोलाहल बाधा नहीं रहता।
इस प्रकार, ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग द्वादश ज्योतिर्लिंगों की श्रृंखला में वह बिंदु है जहाँ साधक समझने लगता है कि शिव केवल कथा नहीं, केवल प्रतीक नहीं, बल्कि **अनुभव** हैं। जहाँ ॐ की गूंज समाप्त होती है, वहीं शिव का साक्षात्कार प्रारंभ होता है।
**हर हर महादेव।**
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